एड. राजीव मिश्र मुंबई
जब से चुनाव के घोषणा भई है, तबसे गाँव में गर्मी बढ़ि गय है। जेहिके देखो एक-दूसरे के शक के नजर से देखि रहा है। जेहिके चुनाव लड़े के है उ चुपचाप बइठे हैं, पर उनके चेला-चपाड़ी के अलगे चलि रहा है। पिछले परधान लालजी तो मैदान में हईये हैं उनके बाद कइओ प्रत्याशी मैदान माँ कूदय के तैयार बइठे हैं। उनके पाछे उनकर समर्थकन के अलगे स्वैग है। चुनाव के घोषणा नहीं भई है, पर हार-जीत के अनुमान लागय शुरू होय गा है। आज सुबह-सुबह मंगरू के दुवारे यादव पुरवा के रामधनी पहुंचे अउर पहुँचतय जोर से हाँक लगाए। उनकर आवाज सुनतय अंदर से मंगरू निकरे – कहाँ हो लंबरदार? कहाँ सुबह-सुबह तुम्हरी सवारी निकरि परी। कुछौ नहीं मंगरू, बस इहै चुनाव कय राह-चाह देखय निकरे रहे। तुम का कहत हौ, यहि बार लालजी फिनि से परधानी जीतिहैं? का पता रामधनी पर काम तो किये हैइहैं हय। काम का घंटा किये हैं, जगतू के घर से सामने वाला चकरोट नहीं बनवाय पाए। भैया जब चकबंदी में उहाँ चकरोट हयियय नहीं है तो कहाँ से निकारि देय? यही, यही बात पे तो पूरा गाँव गुस्सा में हय। यहि बार लालजी के चुनाव जीतब छोड़ि देव, जमानत बचाइब मुश्किल होइ जाई। तो फिर केकर उम्मीद लागि रही है। हमका का लागत है मंगरू यहि बार लहुरी के चुनाव लड़ावा जाय। लहुरी तो अबय कलकत्ता से रिटायर होइ के आए हैं। अबहीं तो उनका केउ कायदे से चिन्हबौ नहीं करत हैं, गला खँखारत रामधनी मंगरू से बोले। अरे भइया, तुम तौ एकदमै बउरहा हो। उनके पास पइसा है अउर जेहिके पास पइसा है उहइ ई चुनाव में जीती। बाकी काम-धाम के मारो गोली, अगर कहो तो शाम के तुम्हरे समर्थन क बात लहुरी से करी। वइसय लहुरी हमसे कहें हैं परचा दाखिल करय से लेइके जीत तक रोज हजार रुपिया अउर शाम के दारू अउर चखना फ्री। अच्छा किहो भइया, हमका छोटकना खातिर साईकिल लेवय के है, लालजी गए भवानी के भक्खर मा। होत सुबह मंगरू अउर रामधनी लहुरी के दुवारे कुर्सी पे बईठ के घुघुरी खाय के चाय पी रहें हैं अउर बगल में लोकतंत्र झिलगंही खटिया में आखिरी साँस लेइ रहा है।
