मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : जिलेदार न आवै का चही

अवधी व्यंग्य : जिलेदार न आवै का चही

एड. राजीव मिश्र
मुंबई

सुखदेव अपने बप्पा के जीयत कमाई के कउनउ सुख नही देइ पाए। न कउनउ काम-धाम न कउनउ कमाई-धमाई, बस दिन भर बइठ के खटिया तोरत रहें। सुखदेव के बप्पा अपने जियतय सुखदेव के बियाह कइ दिए रहे, पर मेहरिया के आये के बाद भी सुखदेव अपने मेहरिया के कउनउ सुख नही देइ पाए। सुखदेव के बियाह के लगभग चार बरिस होइ गवा है अउर यहि चार बरिस में सुखदेव तीन उपलब्धि हासिल किहिन, बरिस दर बरिस, हवलदार, सूबेदार अउर तसिलदार पूरे तीन गजटेड ऑफिसर पैदा कइ दिहिन। सुखदेव बो सुखदेव के काम-धंधा बदे कहि-कहिके थक गईं पर सुखदेव हैं कि कान पे जू नही रेंगत है। एक दिन सुखदेव के पड़ोसी लौटन दिल्ली से सुखदेव का फून कइके कहें, अइसा है सुखदेव चइत चून के महीना में ढेर मनई काम से घरे चला गए हैं अगर आइ जात्यो तो काम पे लागि जात्यो। आखिर, मेहरिया के रोज के किचाहिन से सुखदेव भी उबियाय के दिल्ली के राह पकरि लिहे। आज पूरा डेढ़ महीना सुखदेव के परदेश गए होइ गवा। पिछले महीना सुखदेव अपने मेहरिया के एक साथ दुइ हजार रुपिया भेजे रहें। रुपिया पउतय सुखदेव बो के चेहरा खुशी से दमकि उठा। धीरे-धीरे सुखदेव के घर के गाड़ी चल निकरी। यहि सावन में पहिली बार सुखदेव बो सुखदेव के कमाई के चूड़ी अउर मेहंदी खरीदीं। उहइ मेहंदी लगाई के अउर चूड़ी पहिन के पहिली बार हँसत की सुखदेव बो आज झेलुआ पर बईठी अउर जइसय पहिला मारिन, छोटुआ भगतय आवा, भउजी! हे भउजी, भइया आइ गए। कवन भैया रे, सुखदेव बो के लागि नैइहर से उनकर भाय आइ गवा। अरे! दिल्ली से सुखदेव भइया आइ गएँ। इतना सुनतै सुखदेव बो के मानो लकवा मारि गवा होय। आखिर, मन मारि के सुखदेव बो घर आईं अउर बिना बोले गुड़-पानी रखि के अंदर चली गईं। रात होइ गई पर सुखदेव बो सुखदेव से एक आखर नही बोलीं। बिस्तर पे पहुँचतय सुखदेव मेहरिया से बोले, देखो हवलदार की माई, ई पहिला सावन रहा जब हम तुम्हरे पास नही रहे। एक-एक दिन हमरे करेजा पे आरी चलावत रहा। बस सावन भर रहि लेवय देव सावन बाद तुरतय हम दिल्ली चला जाब। ई बात सुनिके सुखदेव बो के गुस्सा उतरि गा अउर लजाय के सुखदेव से बोली, उ तो ठीकय है तसिलदार के बाबू पर यहि सावन में जिलेदार न आवै के चही, इतना कहिके सुखदेव के अकवारी में समाय गई।

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