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कोर्ट के फैसले के इंतज़ार में ठहरी सांसें, लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर मंडरा रहा संकट

 

मुंबई: शहर की चमक-दमक और ऊंची इमारतों के पीछे एक ऐसा इलाका भी है, जहां इन दिनों हर बातचीत का अंत सिर्फ एक सवाल पर जाकर रुक रहा है कि “अगर फैसला हमारे खिलाफ आया तो क्या होगा ?” कोलाबा से लेकर शिवडी, रे रोड, मझगांव, दारुखाना और वडाला तक फैले मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (एमबीपीटी) के विशाल भूभाग पर रहने और कारोबार करने वाले लाखों लोग इस समय गहरी चिंता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं।

मामला अदालत में अंतिम चरण में पहुंच चुका है। मुंबई पोर्ट प्राधिकरण और भूमि उपयोगकर्ताओं के बीच चल रहे लंबे कानूनी संघर्ष में दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें पूरी कर चुके हैं। अदालत में सुनवाई समाप्त हो चुकी है और अब सभी की नजरें उस फैसले पर टिकी हैं, जो कोर्ट की छुट्टियों के बाद कभी भी आ सकता है। यह सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है। यह लाखों लोगों की जिंदगी, रोजगार, कारोबार और उनके भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। पूर्वी मुंबई के इस पूरे क्षेत्र में इस समय एक अजीब-सी बेचैनी पसरी हुई है। छोटे व्यापारी हों, गोदाम संचालक, आयरन-स्टील कारोबारी, मजदूर, ट्रांसपोर्ट से जुड़े लोग या दशकों से यहां रह रहे परिवार का हर कोई एक अनिश्चित भविष्य को लेकर चिंतित है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई परिवार पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। वर्षों पहले उन्होंने सरकारी लीज़ व्यवस्था के तहत यहां अपने घर, दुकानें और कारोबार स्थापित किए थे। लोगों का मानना था कि लीज़ समाप्त होने पर उसका नवीनीकरण उचित शर्तों पर किया जाएगा, जैसा कि आमतौर पर सरकारी भूमि व्यवस्था में होता आया है। लेकिन समय के साथ विवाद बढ़ता गया और अब स्थिति अदालत तक पहुंच चुकी है।

विवाद का सबसे बड़ा केंद्र “रेट्रोस्पेक्टिव रेट्स” यानी पूर्व प्रभाव से लागू किए गए भारी किराए और शुल्क हैं। भूमि उपयोगकर्ताओं का आरोप है कि मुंबई पोर्ट प्रशासन द्वारा लागू किए गए ये शुल्क इतने अधिक हैं कि सामान्य व्यापारी या निवासी उनका वहन नहीं कर सकते। यही कारण है कि सैकड़ों याचिकाएं अदालत में दाखिल हुईं और मामला वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में चल रहा है।

2004 के दौरान जमशेद हरमुसजी वाडिया विरुद्ध बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज पोर्ट ऑफ मुंबई मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह टिप्पणी की थी कि लीज़ का नवीनीकरण उचित और न्यायसंगत शर्तों पर होना चाहिए। इसके बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ। मुंबई पोर्ट की जमीनें शहर के सबसे महत्वपूर्ण और महंगे हिस्सों में आती हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, मुंबई पोर्ट के पास दक्षिण और पूर्वी मुंबई में सैकड़ों हेक्टेयर भूमि है, जिसमें कोलाबा से वडाला तक का पूर्वी तटीय क्षेत्र शामिल है।

एक रिपोर्ट के अनुसार मुंबई पोर्ट ट्रस्ट के पास लगभग 752 हेक्टेयर से अधिक भूमि है, जिसमें बड़ी मात्रा में जमीन वर्षों से लीज़ पर दी गई है। इस क्षेत्र में व्यापार, छोटे उद्योग, गोदाम, ट्रांसपोर्ट गतिविधियां और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़े हजारों लोग कार्यरत हैं।दारुखाना और आसपास के इलाकों में स्क्रैप, आयरन-स्टील, शिप रिपेयर और छोटे उद्योगों का एक बड़ा नेटवर्क दशकों से सक्रिय है। यहां काम करने वाले हजारों मजदूरों और कर्मचारियों का जीवन सीधे तौर पर इन व्यवसायों पर निर्भर है।

अब अदालत के फैसले ने पूरे क्षेत्र को मानो ठहरा दिया है। कई व्यापारी निवेश रोक चुके हैं। नए सौदे टाले जा रहे हैं। लोग संपत्ति की मरम्मत या विस्तार तक करने से डर रहे हैं। सबसे बड़ा डर यह है कि यदि फैसला प्रतिकूल आया तो क्या उन्हें मुंबई छोड़नी पड़ेगी ? क्या वर्षों से चला आ रहा कारोबार बंद हो जाएगा? क्या परिवारों को गांव लौटना पड़ेगा?
स्थानीय स्तर पर चर्चा का माहौल इतना गहरा है कि चाय की दुकानों से लेकर व्यापारिक कार्यालयों तक, हर जगह सिर्फ इसी मुद्दे पर बातचीत हो रही है। शहर नियोजन और शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मुंबई पोर्ट की जमीनों का प्रश्न केवल रियल एस्टेट या राजस्व का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मुंबई की सामाजिक और आर्थिक संरचना से जुड़ा विषय है। कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि पूर्वी वॉटरफ्रंट के पुनर्विकास की योजनाओं में वहां पहले से रह रहे समुदायों और आजीविका के सवालों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

पूर्वी मुंबई के इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अदालत का फैसला उनके पक्ष में राहत लेकर आएगा या उनकी दशकों पुरानी जड़ें हिल जाएंगी। फिलहाल, कोर्ट की छुट्टियां चल रही हैं। लेकिन छुट्टियों के बाद आने वाला एक फैसला लाखों लोगों के भविष्य की दिशा तय कर सकता है। इसी इंतज़ार में, पूर्वी मुंबई की एक बड़ी आबादी इन दिनों हर सुबह एक नई चिंता के साथ जाग रही है।

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