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बेबाक : अपराध की ‘सोशल’ पाठशाला!..संचार क्रांति ही बन गई है हिंसा का मंच

अनिल तिवारी, मुंबई

तकनीक ने दुनिया को जोड़ा, सूचना को तेज किया और अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया। लेकिन इसी तकनीक का एक भयावह चेहरा अब तेजी से सामने आ रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जो कभी संवाद और मनोरंजन के साधन थे, कई मामलों में हिंसा, स्त्री-विरोध, अपराध के प्रदर्शन और आत्मघाती चुनौतियों के मंच बनते दिख रहे हैं। ब्राजील से लेकर बंगलुरु, अमेरिका से लेकर दिल्ली तक, हाल की घटनाएं बताती हैं कि डिजिटल दुनिया का अंधेरा अब केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं रहा; वह घरों, सड़कों, रिश्तों और समाज की संवेदना तक पहुंच चुका है।
डिजिटल हिंसा की ट्रेनिंग
ब्राजील में हाल में टिक-टॉक पर ऐसे वीडियो सामने आए, जिनमें कुछ पुरुष कथित रूप से महिलाओं द्वारा प्रस्ताव ठुकराने की स्थिति में उन पर हमला करने जैसी हरकतों का अभिनय या प्रशिक्षण करते दिखे। इसे ‘सेल्फ-डिफेंस’ या मजाक की आड़ में परोसा गया है, लेकिन इसका मूल स्वर स्त्री-विरोधी और हिंसक ही है। यह घटना इसलिए भी अधिक चिंताजनक है क्योंकि दुनिया पहले ही महिलाओं के खिलाफ हिंसा और फेमिसाइड की गंभीर समस्या से जूझ रही है। जब हिंसा को ‘ट्रेंड’, ‘चैलेंज’ या ‘मजाक’ बनाकर पेश किया जाता है तो समाज में महिला-विरोधी मानसिकता को और बल मिलता है। यह केवल डिजिटल सामग्री नहीं, बल्कि हिंसा के सामान्यीकरण की प्रक्रिया है।
बंगलुरु में हत्या का फिल्मांकन
भारत की तकनीकी राजधानी कहे जानेवाले बंगलुरु से भी एक दिल दहला देनेवाला मामला सामने आया। एक महिला अपने प्रेमी को कथित रूप से झांसे देकर बुलाती है, उसे बांधा जाता है और फिर आग लगाकर हत्या कर दी जाती है। सबसे भयावह बात यह कि आरोपी पीड़ित के अंतिम क्षणों को मोबाइल में रिकॉर्ड करती है। यह घटना केवल हत्या नहीं, बल्कि अपराध के ‘प्रदर्शन’ की मानसिकता को भी उजागर करती है। अपराधी के लिए वैâमरा अब गवाह भर नहीं रह गया, बल्कि कई मामलों में शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम बनता दिख रहा है। किसी की पीड़ा को रिकॉर्ड करना बताता है कि संवेदना, भय और अपराध-बोध जैसे मानवीय नियंत्रण कितने कमजोर पड़ रहे हैं।
अपराध की ऑनलाइन पाठशाला
सोशल मीडिया पर पैâले खतरनाक ट्रेंडों का एक बड़ा उदाहरण अमेरिका का ‘किआ चैलेंज’ रहा। इसमें कुछ खास किया और हुंडई कारों की चोरी के तरीके दिखानेवाले वीडियो वायरल हुए। इसके बाद कई किशोरों द्वारा कार चोरी, तेज रफ्तार और दुर्घटनाओं की घटनाएं सामने आर्इं। २०२२ में न्यूयॉर्क के बफेलो में चोरी की कार से हुए हादसे में चार किशोरों की मौत हुई और पुलिस ने इसे इसी ऑनलाइन ट्रेंड से जोड़कर देखा। यह मामला दिखाता है कि जब सोशल मीडिया अपराध की प्रक्रिया को ‘वैâसे करें’ वाले कंटेंट में बदल देता है तो उसका असर मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता। किशोरों में जोखिम लेने, कानून तोड़ने और वायरल होने की इच्छा मिलकर जानलेवा परिणाम पैदा कर सकती है।
खेल के नाम पर मौत
इसी तरह ‘ब्लैकआउट चैलेंज’ जैसी खतरनाक ऑनलाइन चुनौतियों ने दुनियाभर में परिवारों को तबाह किया। अमेरिका और ब्रिटेन में कई परिवारों ने टिक-टॉक के खिलाफ मुकदमे दायर किए, यह आरोप लगाते हुए कि प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम ने बच्चों को ऐसे घातक वीडियो दिखाए। २०२६ में भी छह परिवारों द्वारा दायर मुकदमों में दावा किया गया कि बच्चों की मौत ऐसे ही खतरनाक ऑनलाइन चैलेंजों की नकल के कारण हुई। यहां समस्या केवल किसी एक वीडियो की नहीं है, बल्कि उस डिजिटल ढांचे की है जो सनसनी, खतरे और चरम व्यवहार को अधिक दृश्यता देता है। बच्चे और किशोर इस व्यवस्था के सबसे असुरक्षित शिकार बनते हैं।
तकनीक और क्रूरता का मेल
दिल्ली में एक २२ वर्षीय सिविल सेवा अभ्यर्थी की हत्या के मामले ने भी समाज को झकझोर दिया। रिपोर्टों के अनुसार, आरोपी राहुल मीणा ने कथित रूप से हत्या के बाद पीड़िता के फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल कर बायोमेट्रिक लॉकर खोलने की कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा। पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि अपराध के बाद आरोपी ने अपना डिजिटल और भौतिक निशान छोड़ दिया। यह मामला बताता है कि अपराधी अब तकनीक को केवल छिपने के लिए नहीं, बल्कि अपराध को अंजाम देने और लाभ उठाने के साधन के रूप में भी इस्तेमाल कर रहे हैं। बायोमेट्रिक सुरक्षा, डिजिटल भुगतान, मोबाइल लोकेशन और ऑनलाइन गतिविधियां अब अपराध और जांच, दोनों का हिस्सा बन चुकी हैं।
महिलाओं के खिलाफ नया हथियार
महिलाओं के खिलाफ डिजिटल हिंसा का सबसे नया और खतरनाक रूप एआई आधारित डीपफेक और तथाकथित ‘नूडिफाई’ टूल्स हैं। यूएन वुमन ने २०२६ में चेतावनी दी कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय महिलाओं, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, नेताओं के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा अधिक परिष्कृत होती जा रही है। इसमें डीपफेक, छेड़छाड़ की गई तस्वीरें और यौन-आधारित डिजिटल उत्पीड़न शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया की ई-सेफ्टी संस्था ने भी बताया कि ऑनलाइन उपलब्ध डीपफेक सामग्री में भारी हिस्सा अश्लील सामग्री का है और इसका निशाना मुख्य रूप से महिलाएं और लड़कियां होती हैं। यह तकनीक महिला की सहमति, प्रतिष्ठा और सुरक्षा तीनों पर हमला करती है।
मूल सवाल
इन घटनाओं में भौगोलिक दूरी है, पर मनोविज्ञान लगभग समान है। कहीं अपराध को सिखाया जा रहा है, कहीं हत्या को रिकॉर्ड किया जा रहा है, कहीं चोरी को चुनौती बनाकर पैâलाया जा रहा है तो कहीं एआई से महिलाओं की छवि पर हमला किया जा रहा है। यह केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता, तकनीकी गैर-जिम्मेदारी और डिजिटल व्यापार मॉडल की भी समस्या है। सोशल मीडिया कंपनियां अक्सर कहती हैं कि वे आपत्तिजनक सामग्री हटाती हैं, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी सामग्री पहले वायरल क्यों होती है? एल्गोरिदम क्या सनसनी और विकृति को बढ़ावा दे रहे हैं? बच्चों, महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए क्या प्लेटफॉर्म पर्याप्त जिम्मेदारी ले रहे हैं? आज जरूरत केवल कानून कड़ा करने की नहीं, बल्कि डिजिटल संस्कृति बदलने की है। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता, परिवारों में ऑनलाइन व्यवहार पर संवाद, पुलिस में साइबर जांच की क्षमता, अदालतों में डिजिटल सबूतों की समझ और टेक कंपनियों पर वास्तविक जवाबदेही इन सबकी एक साथ आवश्यकता है। ब्राजील का हिंसक ट्रेंड, बंगलुरु की फिल्माई गई हत्या, अमेरिका का किआ चैलेंज, ब्लैकआउट चैलेंज और एआई डीपफेक ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। ये संकेत हैं कि तकनीक जब नैतिकता से कट जाती है तो वह प्रगति का साधन नहीं, अपराध का औजार बन सकती है। समाज को अब यह तय करना होगा कि स्क्रीन के पीछे छिपी क्रूरता को वह मनोरंजन मानेगा या समय रहते उसके विरुद्ध खड़ा होगा।

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