-प्रभुनाथ शुक्ल, भदोही
सोटागुरु चौपाल पर पगड़ी बांधले, मूंछ पर ताव देत आ हथेली पर खैनी मलत बइठल रहलें। खैनी मलत-मलत बोललें, अस्सी चुटकी, नब्बे ताल, तब जाके खैनी के कमाल!
एही बीच खबरीलाल अइसन खबर सुनवलें कि सोटागुरु के मुंह खुलले के खुलल रह गइल।
खबरीलाल कहले, गुरु! खबर पक्का बा। एह बेर रावण दशहरा पर जरे से इनकार कर देले बा। ऊ कहले बा कि अब हम मुफ्त में ना जरब!
सोटागुरु चौंक के पूछलें, काहे रे? का रावण केहू से कर्जा ले लेले बा कि बिजली बिल बकाया हो गइल बा?
खबरीलाल बोललें, ना गुरु! रावण के कहना बा कि त्रेता से लेके कलियुग तक हमहीं जरत बानी। हर साल हमार पुतला बनत बा, पटाखा फूटत बा, नेता जी भाषण देत बाड़ें, जनता ताली पीटत बिया। बाकि समाज में बइठल असली रावण केहू के ना लउकत बा।
रावण रामजी के संदेश भेजले बा, हे प्रभु! हम माता सीता के एक बेर हरले रहनी, ओकर सजा हजारों बरिस से भुगतत बानी। बाकि आज त रोज सीता के अपमान होता। कहीं दहेज खातिर बेटी जरावल जात बिया, कहीं सड़क पर ओकर इज्जत लूटाइल जाता, कहीं ओकर आवाज दबा दिहल जाता। एह सबके पुतला कब जरी?
रावण के शिकायत बा कि महंगाई एतना बढ़ गइल बा कि लंका के खजाना रहितो ओकर परिवार के गुजारा मुश्किल हो गइल बा। पेट्रोल-डीजल महंग, सरसों के तेल महंग, रोजी-रोजगार गायब। ऊपर से हर साल बिना बोनस आ बिना तनखाह के जरे के ड्यूटी!
रावण कहले बा, जब छोट-मोट काम खातिर लोग कमीशन मांगता, कुर्सी खातिर जोड़-तोड़ होता, झूठ के सहारे राजनीति चमकत बा, त फेर हमहीं अकेले बुराई के ठेकेदार काहे?
ई सुनके सोटागुरु गमछा से माथा पोछत बोललें, अरे बाप रे! अब त दशहरा के पूरा बजट गड़बड़ा गइल। पुतला ना जरी त नेता जी के भाषण के विषय का रही? पटाखा बेचे वाला का करी? आ फोटो खिंचवावे वाला लोग कहां जाई?’
खबरीलाल हंसत बोललें, ‘गुरु! एह बेर असली परीक्षा जनता के बा। पुतला जरा के बुराई खतम ना होखे। जबले मन के भीतर लोभ, लालच, अहंकार, भ्रष्टाचार आ अन्याय जियत रही, तबले रावण हर साल नया रूप धरके लवटत रही।
एह दशहरा पर रावण के एगो सवाल हमनी सभे से बा, हे मनई! पहिले अपना भीतर के रावण के मारा, तब हमार पुतला जरइहा। ना त हर साल हम जरब, राख होखब, आ अगिला साल फेर ओही ठाठ से लवट आइब।
पुतला जरावल आसान बा, अपना भीतर के बुराई जरावल मुश्किल। असली दशहरा ओही दिन होई, जवना दिन समाज से अन्याय, भ्रष्टाचार आ नारी के अपमान के अंत होई।
!!समाप्त!!
