प्रभुनाथ शुक्ल भदोही
अरे भइया! ई साल त बदरवा अइसन रूठ गइल बा जइसे गाँव के दुलहिन सास से नाराज होके कोठरी में बइठ गइल होखे। जे असाढ़ लगते पहिले गरजत-बरसत धरती के सींच देत रहे, ऊ अब आसमान में घूम-घूम के बस आंखमिचौली खेलत बा। धरती फाटत जात बा, पोखरा सूखत जात बा, किसान के माथा पर चिंता की लकीर गहरात जात बा, बाकि बदरवा के तनिको दया नइखे आवत।
मुंबई जइसन शहर, जहां हर साल पानी से लोग परेशान हो जाला, उहवां भी लोग बादर के राह ताकत बा। बादर आवत त जरूर बा, काला-काला रंग बदलत बा, गरजत बा, बाकि पानी के एक बूंदों ढंग से ना गिरावत। उहवां पानी के किल्लत होखे लागल बा। लोग कहत बा कि मानसून के गाड़ी कहीं बीच रास्ता में फंस गइल बा।
इधर यूपी के हालत अउरी खराब बा। दुपहरिया में सड़क तवा जइसन तपत बा। घर से बाहर निकलल मुश्किल हो गइल बा। किसान लोग खेत में खड़ा होके आसमान ताकत बा कि कब बादर घिरिहें आ कब पानी बरसी। धान के रोपनी के समय निकलत जात बा, लेकिन खेत में पानी के नामोनिशान नइखे। बूढ़-बुजुर्ग कहत बाड़ें कि अइसन गर्मी आ अइसन इंतजार बहुत कम देखे के मिलेला।
सबसे मजेदार बात ई बा कि बदरवा केहू के ना सुनत। ना किसान के, ना जनता के, ना सरकार के। आजकल त हर चीज पर आदेश चल जाला, लेकिन बदरवा पर केकरो हुकूमत ना चले। अगर ई बादर कहीं सरकारी मुलाजिम रहित त अबले कई गो नोटिस मिल गइल रहित। अगर तबहियों ना सुनित त जांच कमेटी बैठ गइल रहित। गाँव के चउपाल पर लोग मजाक में कहत बा कि अगर बदरवा धरती पर रहित आ सरकार के बात ना मानित त कब के इनकर एनकाउंटर हो गइल रहित। बाकि परेशानी ई बा कि बादर त आसमान में बा, उहां तक पुलिस जाई कि बुलडोजर, ई त भगवाने जाने।
फिलहाल, जनता पसीना बहावत बा, किसान चिंता में बा आ धरती आसमान से पानी के आस लगवले बइठल बा। अब इहे दुआ बा कि बदरवा के मन पसीजे, ऊ रूठलपन छोड़ दे आ जमके बरस जाए, ताकि खेत हरियर होखे, किसान मुस्कुराए आ लोगन के गर्मी से राहत मिले।
!!समाप्त!!
