मुख्यपृष्ठनए समाचारमोटा भाई, जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे!

मोटा भाई, जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे!

-दूसरों के आंदोलन दबाने वाली पुलिस अब अपने ही मुख्यालय पर आंदोलन करने लगी!

वाह रे वक्त! क्या गजब का पलटा मारा है! मोटा भाई, जब छात्रों के आंदोलन दबाने हों, नौजवानों की आवाज रोकनी हो, नागरिकों के विरोध-प्रदर्शनों पर सख्ती दिखानी हो, तब पुलिस का डंडा व्यवस्था का सबसे भरोसेमंद हथियार बन जाता है!
लेकिन जब उसी पुलिस के अपने अधिकारी का तबादला होता है, तो पुलिसकर्मी भी विरोध में उतर आते हैं। और जब उनकी अगुवाई करने वाला एसीपी निलंबित होता है, तो मामला और दिलचस्प हो जाता है! दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर पुलिसकर्मियों का प्रदर्शन मानो सत्ता को उसी की भाषा में जवाब देने की कोशिश हो! मोटा भाई, जिन्हें आप जनता के आंदोलन संभालने भेजते थे, वे अब खुद आंदोलन करने लगे हैं!
छात्र सड़क पर उतरें तो अनुशासन का पाठ। नागरिक सवाल पूछें तो कानून-व्यवस्था की दुहाई। लेकिन पुलिसकर्मी अपने ही अधिकारियों के खिलाफ मुख्यालय पहुंच जाएं तो अनुशासन आखिर किसे पढ़ाया जाए? कल तक जो पुलिस प्रदर्शनकारियों को समझाती थी कि सड़क पर उतरने से कुछ नहीं होगा, आज वही अपनी शिकायत लेकर सड़क पर खड़ी दिखाई दी! और विडंबना देखिए! पुलिस मुख्यालय के बाहर पुलिसकर्मी अपने ही पुलिस आयुक्त से मिलने की मांग कर रहे थे। यानी पुलिस को अपनी बात पुलिस तक पहुंचाने के लिए भी प्रदर्शन का रास्ता अपनाना पड़ा!
मोटा भाई, आप दूसरों की आवाज दबाने के लिए जिस सख्त व्यवस्था पर भरोसा करते हैं, उसी व्यवस्था के भीतर से विरोध उठने लगे तो इसे क्या कहेंगे?
इसे समय का फेर कहिए, व्यवस्था की विडंबना कहिए या फिर सत्ता के लिए एक सबक! क्योंकि लोकतंत्र में विरोध की आवाज को केवल अनुशासन और ताकत से हमेशा के लिए खामोश नहीं किया जा सकता। और हां, मोटा भाई! डंडा चलाने वाली व्यवस्था जब खुद सवाल पूछने लगे, तो समझ लीजिए, सवाल अब पुलिस बैरिकेड के इस पार भी हैं और उस पार भी!

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