-हंगामे की आड़ में ठेकेदारों का काम आसान!
सुरेश गोलानी / मुंबई
मीरा-भायंदर महानगरपालिका की शुक्रवार को हुई महासभा में जो कुछ भी हुआ, उसने लोकतंत्र को तो शर्मसार किया ही, साथ ही कई बड़े गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। सदन के प्रेक्षक गैलरी मे पत्रकारों और आम नागरिकों के साथ भाजपा के नगरसेवकों द्वारा सरेआम गाली-गलौच, मारपीट और बदसलूकी क्या सिर्फ एक तात्कालिक गुस्सा था, या फिर इसके पीछे ७०० करोड़ रुपए के प्रस्तावों को बिना चर्चा के पास कराने की कोई गहरी प्रशासनिक व राजनीतिक साजिश थी? यह सवाल अब शहर के गलियारों में गूंज रहा है। महासभा में कुल ३२ विषय एजेंडे पर थे, जिनमें शहर के विकास से जुड़े करोड़ों रुपए के प्रस्ताव शामिल थे। नियमों के मुताबिक, जनहित के इन मुद्दों पर सदन में विस्तृत चर्चा और विपक्ष के सवालों के जवाब होना जरूरी था। लेकिन आरोप है कि महापौर और सत्ताधारी दल ने नवरात्रि के कार्यक्रमों में जाना है, जैसा बचकाना बहाना बनाकर काम समेटने की जल्दबाजी दिखाई। न तो ‘लक्ष्यवेधी सूचनाओं’ को जगह दी गई और न ही प्रश्नोत्तर काल चलने दिया गया। जब विपक्ष ने इस जल्दबाजी का विरोध किया, तो सदन में तनाव बढ़ गया। इसी बीच, प्रेक्षक गैलरी में वीडियो रिकॉर्डिंग के शक का एक बड़ा बवंडर खड़ा किया गया। भाजपा के करीब १६ नगरसेवक गैलरी में घुस गए और नागरिकों व पत्रकारों के साथ मारपीट और बदसलूकी शुरू कर दी।
अब कड़ियां जोड़कर देखी जा रही हैं कि जब बाहर मचे हंगामे और अफरा-तफरी की आड़ में सत्ताधारी दल ने बहुमत के बल पर करोड़ों के प्रस्तावों को बिना किसी बहस के पास कर दिया। इसमें भूमिगत गटर योजना के दूसरे चरण के लिए ५०० करोड़ रुपए और मलनि:सारण केंद्र के रखरखाव और पुनर्निर्माण के लिए १८८ करोड़ रुपये शामिल हैं। इसके अलावा बस सेवा का किराया बढ़ाने और सूर्या जलापूर्ति योजना से जुड़े कई अन्य प्रस्ताव भी बिना किसी रोक-टोक के पास करा लिए गए।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी नगरसेवकों ने इस पूरी कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि महीने में सिर्फ एक बार होने वाली महासभा में अगर ७०० करोड़ रुपये के खर्च पर ७ मिनट भी चर्चा न हो, तो इसे लोकतंत्र वैâसे कहा जाए।
