मुख्यपृष्ठस्तंभसठिया गइल का...!..सरकार बदलने की बात करते ही लोकतंत्र खतरे में!

सठिया गइल का…!..सरकार बदलने की बात करते ही लोकतंत्र खतरे में!

-फडणवीस भाऊ, चुनाव में हार-जीत बंद हो गइल का?
भाईसाहब, लोकतंत्र में सरकार जनता बनाती है और जनता ही बदलती है। लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की शनिवार वाली दलील सुनकर लगता है कि सरकार बदलने की बात करना भी अब संदिग्ध गतिविधि हो गई है!
भाऊ ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि विपक्ष चुनाव से सत्ता हासिल नहीं कर सकता, इसलिए देश में अराजकता फैलाकर सत्ता हथियाना चाहता है। सबूत के तौर पर वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के ‘रेजीम चेंज’ वाले बयान का हवाला दिया। ऊपर से फरमाया कि लोकतंत्र के लिए मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर अपरिहार्य है!
अरे भाऊ, गजबे हो गइल!
प्रशांत भूषण ने सत्ता परिवर्तन की इच्छा जरूर जताई थी, लेकिन यह भी कहा था कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना अपराध नहीं है। उधर कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने तो भूषण के बयान से दूरी बनाकर स्पष्ट किया कि उनके आंदोलन की मांग सरकार बदलना नहीं, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना है।
मगर भाई, राजनीति का चमत्कार देखिए! एक आदमी सत्ता परिवर्तन की बात करे और पूरे विपक्ष के खिलाफ अराजकता का आरोपपत्र तैयार! दूसरी तरफ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने याद दिलाया कि लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार का विरोध करना, उसकी खामियां उजागर करना और चुनाव के जरिए उसे हटाने का प्रयास करना है।
अब सवाल है भैया, २०१४ में कांग्रेस सरकार गई और भाजपा आई, तब लोकतंत्र की विजय हुई थी। भविष्य में कोई दूसरी सरकार आएगी तो क्या लोकतंत्र की पराजय कहलाएगी? हिंसा और असंवैधानिक तरीकों से सत्ता पलटना निश्चित रूप से गलत है। लेकिन शांतिपूर्ण आंदोलन और चुनावी सत्ता परिवर्तन को एक ही तराजू पर कैसे तौलेंगे? भिया, सरकारें पांच साल के लिए चुनी जाती हैं, पांच पीढ़ियों के लिए नहीं! ई बताइए फडणवीस भाऊ, सत्ता परिवर्तन का नाम सुनते ही लोकतंत्र सठिया गइल का… कि कुर्सी से मोह कुछ ज्यादा ही बढ़ गइल बा?

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