हरिगोविंद विश्वकर्मा
विज्ञान ने मानवता को बहुत कुछ दिया है। मसलन-पहिया, इंजन, बिजली, इंटरनेट और आजकल एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। लेकिन भारत ने विज्ञान को एक दुर्लभ चीज दी है। वह दुर्लभ चीज है गाली। गाली विज्ञान अद्भुत विधा है। चूंकि गाली मनुष्य की योग्यता को ढंक देती है। इसलिए गाली मानव के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई है। गाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह तर्क की जगह ले लेती है। जिस व्यक्ति के पास तथ्य नहीं होते, उसके पास गालियां अवश्य होती हैं। इस तरह गाली अयोग्यता पर सबसे सुंदर पर्दा डाल देती है।
प्रेषित होती भावनाएं
गाली में रहस्य होता है, गाली में रोमांच भी होता है और गुदगुदी भी। इसलिए गाली आमतौर पर सबको प्रिय है। भारत के लोग गर्व करते हैं कि गाली स्वदेशी खोज है। पहले गाली भावनाओं का अनियंत्रित विस्फोट होती थी। लोग किसी विषय पर बहस करते थे। बहस के दौरान तर्क देते थे। अब तर्क का स्थान गाली ने ले लिया। गाली विकसित सामाजिक कौशल बन गई है। समय बचाने के लिए लोग सीधे गाली दे देते हैं। गाली डिजिटल युग की सबसे बड़ी दक्षता है। समय बचता है और उद्देश्य भी हासिल हो जाता है। गाली देकर लोग संतुष्ट हो जाते हैं। मान लेते हैं कि उनकी भावनाएं उस तक प्रेषित हो गर्इं, जिसे गाली दी।
गाली का विकास मानव विकास के साथ ही हुआ था। कहने का तात्पर्य गाली विधा समाज में प्राचीनकाल से मौजूद रही है। लेकिन तब गाली लोग सार्वजनिक तौर पर नहीं देते थे। कह सकते हैं कि सभ्यता और शराफत ने गाली का गला घोंट दिया था। अब जैसे-जैसे मनुष्य सभ्यता जैसी आउटडेट चीज को टाटा-बाइ-बाइ कर रहा है। जैसे-जैसे वह शराफत का चोला उतार कर फेंक रहा है। वैसे-वैसे गाली के अच्छे दिन आ रहे हैं। पिछले एक दशक में तो गाली को सार्वजनिक मान्यता मिल गई है। कुछ लोग गाली देने और खाने की कला में निपुण हो जाते हैं। वे गर्व से बताते हैं कि देखा मुझे कितने लोग गाली दे रहे हैं। मुझे गालियां खाने की आदत पड़ गर्इं।
महानता का पैमाना
कई लोग अपने बच्चों को गाली सिखाते हैं। गाली का अभ्यास करवाते हैं। आगे चलकर उनका बच्चा गालीबाज के रूप में नाम कमाता है। अब तो गाली का राजनीति से भी चोली-दामन का संबंध हो गया। हर राजनीतिक पार्टी में गाली प्रकोष्ठ बना दिया गया है। कई गाली-प्रवक्ता भी हैं, जो खुलेआम गाली देते हैं। इधर सोशल मीडिया ने लाखों गालीबाज पैदा कर दिए। इन्हें गाली वैज्ञानिक कहा जा सकता है। ये लोग बिना विषय जाने भी गाली देते हैं। कई लोग गाली देने में पीएचडी जैसा आत्मविश्वास रखते हैं। गाली विद्वता की कमी को ढंक देती है। जितनी कम जानकारी, उतना अधिक गाली और आत्मविश्वास।
आज के दौर में आदमी की महानता उसकी उपलब्धियों से नहीं है। उसकी महानता इस बात से है कि वह एक दिन में कितनी गालियां खाता है। गाली खाने के बाद भी अगले दिन उसी मुस्कान के साथ वैâमरे के सामने आता है। गाली एक कला है। गाली देना उससे भी बड़ी कला है और गाली खाना सबसे बड़ी कला है। पहले लोग सम्मान कमाने की कोशिश करते थे। आजकल लोग गालियां कमाते हैं। जिस दिन किसी की पोस्ट पर हजार गालियां आ जाएं, समझिए समाज ने उस व्यक्ति को लोगों ने स्वीकार कर लिया है। दरअसल, जिस देश में तर्क हार जाए और गाली जीत जाए, वहां गाली केवल भाषा नहीं रहती, वह विज्ञान बन जाती है। और जब किसी विज्ञान का स्वर्णिम युग आता है, तो प्रयोगशालाओं में नहीं, टीवी स्टूडियो, सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर उसके सबसे सफल प्रयोग दिखाई देते हैं। शोधपत्र कम छपते हैं, गालियां ज्यादा प्रकाशित होती हैं। यही गाली विज्ञान का स्वर्णिम युग है।
