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सरोकार : गरीबों के हिस्से का अनाज गायब! ….दलालों के जाल में फंसा राशन कार्यालय!

-रु. ५००० से १०,००० तक का है रेट
सगीर अंसारी
केंद्र और राज्य सरकारें प्रधानमंत्री गरीब अन्न योजना सहित कई योजनाओं के माध्यम से गरीब परिवारों को मुफ्त या रियायती दरों पर राशन उपलब्ध कराने का दावा करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति कुछ और ही तस्वीर पेश करती है। शिवाजी नगर सहित कई घनी आबादी और स्लम क्षेत्रों में रहनेवाले लाभार्थी बताते हैं कि योजनाओं का वास्तविक लाभ पाने के लिए उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शिक्षा की कमी, प्रक्रिया की जटिलता और कार्यालयों में अव्यवस्था के कारण गरीबों को अकसर दलालों का सहारा लेना पड़ता है। ऐसा ही आरोप शिवाजी नगर स्थित शिधा कार्यालय क्रमांक ४४/ई को लेकर सामने आया है, जहां लोगों का दावा है कि बिना दलाल के किसी भी प्रकार का काम ‘लगभग असंभव’ हो जाता है।
‘केवाईसी अपडेट के नाम पर महीनों चक्कर’
कई लाभार्थियों ने बताया कि केवाईसी या किसी दस्तावेज को अपडेट कराने के लिए उन्हें छह महीने तक कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लोग आरोप लगाते हैं कि अधिकारी अक्सर कागजों में कमी, सिस्टम न चलना, फाइल आगे न जाना या संबंधित कर्मचारी न मिलने जैसे बहानों पर उन्हें बार-बार वापस भेज देते हैं। एक स्थानीय महिला ने बताया, ‘हमने चार महीने से केवाईसी के लिए चक्कर काटे। हर बार कोई न कोई कमी निकाल दी जाती थी, लेकिन जब एक दलाल के पास गए तो दो दिन में काम हो गया।’
दलालों का वर्चस्व?
लाभार्थियों का दावा है कि कार्यालय के बाहर ही नहीं, बल्कि अंदर भी दलाल सक्रिय रहते हैं। आरोप है कि ये दलाल लोगों को प्रक्रिया ‘सरल’ कराने का भरोसा देते हैं और बदले में मोटी रकम वसूलते हैं। कई निवासियों के अनुसार, राशन कार्ड बनवाने या अपडेट कराने के लिए दलाल ५,००० से १०,००० रुपए तक लेते हैं, जो निम्न आय वर्ग के लिए बेहद भारी रकम है।
एक मजदूर ने बताया, ‘हमने खुद जाकर काम करवाया तो महीनों तक फाइल नहीं चली। पर जब दलाल के माध्यम से गए तो एक हफ्ते में कार्ड बन गया। गरीब आदमी करे तो करे क्या?’
लोगों की मजबूरी, अधिकारी खामोश
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार इसकी शिकायत करने की कोशिश की, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि, कुछ अधिकारी आरोपों को निराधार बताते हैं, लेकिन शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि सीधे पैसे की मांग न करते हुए भी प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया जाता है कि लोग मजबूरन दलालों की ओर रुख करते हैं।
एक बुजुर्ग लाभार्थी ने कहा, ‘हमारी चप्पल घिस जाती है, लेकिन काम नहीं होता। घर से लेकर काम तक की मजदूरी का नुकसान होता है। आखिर सरकार की योजनाओं का फायदा हमें कब मिलेगा?’
व्यवस्था सुधार की मांग तेज
राशन वितरण प्रणाली में इन अव्यवस्थाओं को लेकर स्थानीय नागरिकों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पारदर्शिता बढ़ाने, ऑनलाइन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और कार्यालयों में निरीक्षण बढ़ाने की मांग की है।

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