वीना गौतम
१६-१७ जून २०१३ की रात का जिक्र आते ही नींद में भी लोग सिहर जाते हैं। जब आकाश में बिजली चमक रही थी और नीचे मंदाकिनी नदी विकराल रूप में उमड़ रही थी। केदारनाथ की यह भयावह आपदा ५ अगस्त २०२५ को दोपहर १२ बजकर ४० मिनट पर उसके बाद १ बजकर २७ मिनट और फिर २ बजे यानी तीन बार २०१३ की भयावह तबाही वाला मंजर उत्तरकाशी के तीन गांव में दोहराया गया। पहले धराली में रूह कंपा देने वाला मंजर ३४ सेकंड के भीतर सब कुछ तबाह कर गया। गंगोत्री के रास्ते में मुख्य ठहराव स्थल के रूप में जाना जाने वाला धराली गांव महज ३४ सेकंड की जलप्रलय में तबाह हो गया।
हर बार तबाही
मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, चीफ सेक्रेटरी आनंद वर्धन की मानें तो लगभग ७०० की आबादी वाले गांव में ४ लोगों की मौत हो गई और १०० लोग लापता हैं। १५० से ज्यादा घरों वाले इस गांव में ३० होटल रिसॉर्ट तथा २५ होम स्टे वाले गांव में महज आधे मिनट के भीतर, आधे से ज्यादा घरों, होटलों और रिसोर्ट्स का नामोनिशान नहीं बचा। ऐसे में जाहिर है प्रशासन द्वारा बताई गई हताहत लोगों की संख्या अनुमान से भी कहीं ज्यादा हो सकती है। अभी लोग धराली के इस भयावह मंजर की हतप्रभता की जकड़ में ही थे कि ठीक दोपहर १२ बजे धराली गांव से ५ किलोमीटर दूर हर्सिल गांव में भी धराली की तरह ही एक भयावह बादल फट गया और तेलगाढ़ नाले में आई ऊफनती हुई बाढ़ ने सेना के एक कैंप को अपनी चपेट में ले लिया। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक ११ जवान लापता थे और सेना का हैलीपेड बिल्कुल तबाह हो चुका था। हर्सिल की तबाही भी अभी हाहाकार कर रही थी कि ठीक ३ बजे एक और तबाही पास के सुक्खी गांव में हुई। यहां भी एक दर्जन से ज्यादा लोगों के गायब होने की बात कही जा रही है। हिमालय की दरार पर बसा धराली का यह भयावह मंजर १० साल में तीसरी बार देखने को मिला। साल २०१३ और २०१४ में भी यहां बादल फटे थे, तब भी खीर नाले ने भी ऐसी तबाही मचायी थी। इससे पहले सन १८६४ में भी इसी तरह की तबाही ने धराली का नामोनिशान मिटा दिया था। १० साल पहले भूगर्भ वैज्ञानिकों ने शासन-प्रशासन को धराली गांव को कहीं और बसाने की सलाह दी थी। कहते हैं प्रशासन ने भी गांव वालों से इसकी गुजारिश की थी, लेकिन यह गांव गंगोत्री के रास्ते में उस जगह बसा है, जहां गंगोत्री धाम तक पहुंचने से पहले का आखिरी बड़ा वैंâप लगता है।
आपदा को निमंत्रण
जाहिर है यहां तीर्थ यात्रियों से बहुत ज्यादा आमदनी होती है, तो भला ऐसी कमाई वाली जगह को छोड़कर कौन जाना चाहता है। जबकि भूगर्भ वैज्ञानिकों ने शासन, प्रशासन और गांव वालों को तब भी बताया था कि आपदाओं के लिहाज से धराली गांव आपदा बम पर बैठा हुआ है। मगर सोर्स-सिफारिश लगवाकर और शासन-प्रशासन में ओहदेदार अधिकारियों को खिला-पिलाकर यहां के लोग अपनी जगह पर ही बने रहे और २०१३ के बाद तीसरी बार फिर से आपदा की चपेट में आने के कारण दो तिहाई से ज्यादा गांव का सारा ढांचा पतझड़ में गिरे सूखे पत्तों की तरह उड़ गया। धराली ट्रांस हिमालय की मेन सेंट्रल थर्स्ट में बसा हुआ है, वह भी ४,००० मीटर के ऊपर। दरअसल, यह थर्स्ट एक दरार है, जो मुख्य हिमालय को ट्रांस हिमालय से जोड़ती है। यह भूंकप का अति संवेदनशील क्षेत्र है, जिस पहाड़ से खीर गंगा नदी निकलती है। वह ६,००० मीटर की ऊंचाई पर है। इसलिए जब सैलाब आता है तो वह बुलेट की माफिक तेज और भयावह होता है। अब तक के उदाहरण बताते हैं कि धराली में जब जब तबाही आई है, वह हृदयविदारक ही आई है। दरअसल पानी का प्रवाह इतने वेग से आता है कि मजबूत से मजबूत लोहे और सीमेंट का स्ट्रक्चर पानी के बुलबुले की तरह ध्वस्त हो जाता है। पिछले पांच सालों में यानी २०२० से २०२५ के बीच उत्तराखंड और हिमाचल में अत्यधिक वर्षा, बादल फटने और इस तरह की जलप्रलय की ७,७०० से भी ज्यादा आपदाएं हुई हैं। हालांकि, इनमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मौतें बहुत ज्यादा नहीं हुईं। कुल १६१ लोगों की मौत का और २३० से ज्यादा लोगों के गायब होने का ही सरकारी दस्तावेज पुष्टि करते हैं। लेकिन व्यावहारिक बुद्धि रखने वाला कोई भी इंसान समझ सकता है कि इन सरकारी आंकड़ों और हकीकत में कितना बड़ा फासला होगा।
लेकिन असली चिंता की बात तो यह है कि जब महज १,८७५ दिनों के भीतर ही दर्ज आंकड़ों के मुताबिक ७,००० से ज्यादा जलप्रलय की छोटी-बड़ी सामान्य से लेकर बेहद डरावनी घटनाएं घटी हैं, इसके बाद भी हिमाचल और उत्तराखंड की सरकारों ने बार-बार इन घटने वाली तबाही की घटनाओं को रोकने के लिए आखिर क्या ठोस उपाय किए हैं? उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश गर्व से ढिंढोरा पीटते हैं कि वे देश के सबसे पर्यटक अनुकूल राज्य हैं और दोनों ही राज्य दिन-रात देश-विदेश के पर्यटकों को अपने यहां बुलाने के लिए नई से नई कोशिशें करते रहते हैं। आखिर इन राज्यों की सरकारों और प्रशासन को लगातार यह डराने वाला मंजर क्यों परेशान नहीं करता कि हर गुजरते साल के साथ मानसूनी आपदाओं में भयानक वृद्धि होती जा रही है?
कुदरत से खिलवाड़
जब हजारों सालों से यहां स्थित धार्मिक तीर्थस्थलों पर लोग पहुंचते रहे हैं तो सरकारों को ये क्यों लगता है कि आज का इंसान बिना लग्जरी सुविधाओं के यहां तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल, यहां की सरकारें, प्रशासन और स्थानीय जनता पर्यटकों की खुशी और उनके आराम के लिए इन दुर्गम स्थानों पर सुविधाओं का यह रेला नहीं खड़ा कर रहीं, यह रेला तो वे अपनी दिन दूनी-रात चौगुनी कमाई की ख्वाहिशों के लिए कर रहे हैं।
दरअसल, यह सरकारों से लेकर स्थानीय लोगों तक का लालच है कि वह प्रकृति को अंगूठा दिखाते हुए इस पूरे साल इन क्षेत्रों को पर्यटकों से आबाद रखना चाहते हैं। आखिर किसी १५० वाले गांव में ३० से ज्यादा होटल व रिसॉटर्््स कहां का सामान्य आंकड़ा है? छोटे से गांव में इतने ज्यादा होटल, रिसॉर्ट्स, सीमेंट-कंक्रीट के ढांचे, महज पैसों के लालच के लिए गांव को तबाही के बम में तब्दील कर लेना नहीं तो और क्या है? हमारी राज्य सरकारों को उनके प्रशासनिक अमले को और स्थानीय लोगों को ये समझना होगा कि धरती के चप्पे-चप्पे को पर्यटन की ऐशगाह या धर्म के फैशनेबल उन्माद के हवाले नहीं किया जा सकता। हाल के सालों में देश के पहाड़ी राज्यों को जिस तरह बार-बार तबाही के मंजरों ने झकझोरा है, उससे जितना जल्दी हो सभी पीड़ित पक्षों को यह अक्ल आना जरूरी है कि कुदरत सिर्फ दोहन के लिए नहीं है।
(लेखिका विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में कार्यकारी संपादक हैं)
