संजय श्रीवास्तव
चर्चा और कुछ गंभीर कवायदों के बावजूद इस्लामी नाटो का गठन कठिन है, पर यदि यह हो ही गया तो दुनिया की यह दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति तमाम भू-राजनीतिक और रणनीतिक समीकरणों को एक झटके में बदल देगी। पाकिस्तान के अपने मंसूबों में कामयाबी की लाख कोशिशों के बावजूद कई वजहों से यह अभी तो दूर की कौड़ी ही नजर आती है।
तीसरी ताकत!
अरब, इस्लामिक या मुस्लिम नाटो की चर्चा एक बार फिर से तेज है। ४० से ज्यादा अरब और इस्लामिक देश अपनी सुरक्षा के लिए पश्चिमी देशों के गठबंधन- नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) की तरह एक अलग संगठन बनाने वाले हैं। नाटो के अनुच्छेद-५ की तरह ही इसके किसी भी देश पर हमला सभी देशों पर आक्रमण माना जाएगा और सारे इस्लामिक देश उस पर टूट पड़ेंगे। पहला खेमा अमेरिका और नाटो देशों का, तो रूस, बेलारूस, ईरान और उत्तर कोरिया का दूसरा। अब अगर २५ देशों का मुस्लिम नाटो बना तो ये तीसरी ताकत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति होगी। बीते महीने सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक गठबंधन ‘स्ट्रेटजिक म्युचुअल डिफेंस एग्रीमेंट’ के बाद कहा गया कि अब इसकी शुरुआत हो गई, तो इससे पहले कतर पर इजराइली हमले के हुए आपातकालीन अरब-इस्लामी सम्मेलन में इसका प्रस्ताव रखा गया। इस्लामी नाटो का औपचारिक एलान नहीं हुआ पर मिस्र, ईरान, पाकिस्तान आदि के नेताओं ने साझा सुरक्षा के लिए सैन्य संसाधन की एकजुटता की बात कही।
मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने ‘अरब नाटो’ बनाने की सूरत में २०,००० सैनिक तुरंत देने का दावा किया। ईरान ने इसे ‘इस्लामिक नाटो’ नाम देने की वकालत की तो कुछ अरब देशों ने इसे मजहबी पहचान से बचाने और क्षेत्रीय सुरक्षा संगठन के बतौर पेश करने के लिए इसका नाम अरब सुरक्षा संगठन ही ठीक समझा। इस गंभीर चर्चा के बाद बीते हफ्ते प्रचारित किया गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस पहल के मद्देनजर इसी महीने में सऊदी अरब, यूएई, कतर, मिस्र, जॉर्डन, तुर्की, पाकिस्तान आदि के नेताओं के साथ गाजा मसले और ‘इस्लामिक नाटो’ जैसे नए सैन्य गठबंधन पर गोपन वार्ता करेंगे। सवाल है, क्या वाकई ट्रंप अरब देशों की सुरक्षा के लिए इतने गंभीर हैं, उनकी रुचि इसके निर्माण में मददगार होगी या बाधा? डोनाल्ड ट्रंप खुद को सबका मध्यस्थ, खुदाई खिदमतगार साबित कर नोबेल लेने की कोशिश में गाजा में युद्ध की स्थिति को सुलझाने के लिए इजराइल से और इस्लामिक देशों की सुरक्षा के लिए मुस्लिम नेताओं से बात कर सकते हैं, पर क्या यह कवायद ‘इस्लामिक नाटो’ जैसे संगठन निर्माण के लिए होगी? दशक बीत गया ‘इस्लामिक नाटो’ के विचार और घोषणाओं को सुनते पर कोई ठोस कदम कभी नहीं उठाया गया। अब अचानक सभी पक्ष गंभीर वैâसे हो गए और मुस्लिम बहुल दो दर्जन से ज्यादा देशों को लगा कि ‘इस्लामिक नाटो’ का सपना सच हो सकता है। ‘इस्लामिक नाटो’ के मूल में है इजराइल से टक्कर।
बासीकढी!
अरब देश वास्तव में इजराइल को टक्कर दे सकते हैं या नहीं, इससे अहम प्रश्न है कि क्या अरब देश सचमुच नाटो जैसे किसी मजबूत बल के गठन के लिए गंभीर हैं? नाटो में अमेरिका धुरी की तरह काम करता है और सबसे बड़ा वित्त पोषक है, अरब देशों के नाटो में यह भूमिका कौन निभाएगा? पाकिस्तान इस दावे के साथ खामखां आगे है कि एकमात्र परमाणु संपन्न इस्लामिक देश होने के नाते अगुवाई वही करेगा पर दिवालिए देश के लिए क्या ऐसा संभव है? इस संगठन में पाकिस्तान के प्रभाव और इससे तुर्की की ताकत बढ़ने से हमें कितनी समस्या होगी? हमारे रिश्ते इजराइल और खाड़ी देशों दोनों से समरस हैं, किसकी तरफ जाएंगे? इस्लामिक नाटो से प्रसूत समस्याओं के लिए हमें प्राथमिक स्तर पर क्या करना चाहिए? या फिर इन सारी बातों का जवाब इसमें तलाशना चाहिए कि यह अरब नाटो का विचार अब्राहम समझौतों के खिलाफ है, सो इस तरह की पहल महज प्रतीकात्मक कदम, बासी कढ़ी में उबाल भर है, कार्य होने में संदेह है?
असल में एक दशक पहले जब इसका प्रस्ताव आया था तो इजराइल भी इसका समर्थक था क्योंकि ईरान इससे बाहर था, लेकिन आज अरब की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए अरब देशों की रक्षा नीतियों में बदलाव स्वाभाविक है। अब ‘इस्लामिक नाटो’ अधिक प्रासंगिक लग सकता है। लंबे समय से खाड़ी के देश अपनी हिफाजत के लिए किसी और को पैसे देते रहे हैं, इस मानसिकता में धीरे-धीरे ही सही, बदलाव आ रहा है। क्षेत्रीय सहयोग और साझा रक्षा समझौतों के चलते क्षेत्रीय सुरक्षा की बात कई कोनों से उठ रही है। खाड़ी सहयोग परिषद के छह सदस्यों बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त रक्षा समझौते का ऐसा प्रावधान लागू करने जा रहे हैं, जो नाटो के अनुच्छेद ५ जैसा है। उधर, खाड़ी के शासक अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को महत्व देते हुए अमेरिका पर निर्भरता घटाने के प्रयास में हैं। बावजूद इसके अमेरिका इस तरह की रक्षा संबंधी क्षेत्रीय व्यवस्था का विरोधी नहीं है।
शेखचिल्ली
खाड़ी देशों में सैन्य सहयोग बढ़ने का मतलब है अमेरिकी मौजूदगी और बढ़ना। क्योंकि वहां की रक्षा प्रणाली की रीढ़ अमेरिकी तकनीक और हथियार हैं, जो चीन और रूस की चाहत तथा कोशिशों के बावजूद एक रात में बदलने वाले नहीं। ट्रंप को यह दिखाने को भी होगा कि अमेरिका सिर्फ इजराइल का दोस्त नहीं अरब दुनिया का भी साथी है। इसलिए अमेरिका मुस्लिम देशों के सुरक्षा संगठन का नेतृत्व किसी स्थानीय के हाथ होने के बावजूद उसका समर्थक दिखता है। लेकिन अमेरिकी समर्थन और कुछ अरब देशों के अति उत्साह, पाकिस्तान की अति सक्रियता के बावजूद मुश्किलें कम नहीं हैं।
सऊदी और ईरान की पुरानी रंजिश हो या मिस्र और तुर्की की आपसी खींचतान, पाकिस्तान की घरेलू अस्थिरता और आर्थिक विपन्नता, फंडिंग की अनिश्चितता और अगुवाई की लड़ाई के साथ सभी की अपनी भिन्न सुरक्षा प्राथमिकताओं के चलते ‘इस्लामिक नाटो’ का सपना फिलहाल अधूरा लगता है।
जहां तक भारत की बात है, पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर अरब-इस्लामिक नाटो के वैश्विक मंच का भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है, वह भारत के खिलाफ ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज यानी ओआईसी जैसे मंचों को पहले भी भड़का चुका है। पाकिस्तान का समर्थक तुर्किये जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस्लामाबाद को सैन्य मदद के अलावा तकनीकी विशेषज्ञों को भी भेजा था, इससे जुड़ाव उसे ताकत देगा। पाकिस्तान की बढ़ती आतंकवादी गतिविधियों और उसके जवाब में भारत की कोशिशों को देखते हुए एक पर हमला माने सब पर आक्रमण की शर्त सबसे ज्यादा भारत को प्रभावित करेगी। इजराइल और भारत के बीच व्यापार से लेकर कूटनीतिक रिश्ते ठीक-ठाक हैं। भविष्य में अरब-इस्लामिक नाटो सामने आता है तो भारत और इजराइल के रिश्तों की वजह से गठबंधन भारत को अपने विरुद्ध समझ सकता है।
हालांकि, पाकिस्तान की पोल खुल चुकी है कि वह न्यूक्लियर ताकत और इस्लामी पहचान का पत्ता खेलकर मुस्लिम दुनिया से आर्थिक मदद बटोरने की फिराक में है। अस्थिर अर्थव्यवस्था वाले पाकिस्तान के पास अंतरराष्ट्रीय साख भी नहीं, सबको डर है कि उसके परमाणु हथियार आतंकियों के हाथ लग सकते हैं। खाड़ी देशों की आपसी रक्षा प्रतिबद्धता नाटो सदस्यों जैसी नहीं है। यह व्यवस्था खाड़ी देशों को उन्हें उनके हितों के लिए गैरजरूरी संघर्षों में उलझा सकती है। इसलिए सबका एक मंच पर आना मुश्किल है। हां, यह हो सकता है कि छह जीसीसी देश बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ-साथ तुर्की और मिस्र मिलकर एक क्षेत्रीय रक्षा संगठन बनाएं। लेकिन फिलहाल जहां तक इस्लामिक नाटो के अस्तित्व में आने और उसके प्रभावी होने की बात है, तो यह महज ख्याली पुलाव है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार हैं)
