मुख्यपृष्ठस्तंभसम-सामयिक : ऐसे काम करता है आतंकियों का स्लीपर सेल...!

सम-सामयिक : ऐसे काम करता है आतंकियों का स्लीपर सेल…!

डॉ. ब्रह्मदीप अलूने

मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के महिदपुर जैसे छोटे से कस्बे में करीब तीन दशक पहले सैकड़ों ट्रकें होते थीं। यहां घर-घर ट्रक रखने का रिवाज हो गया था। ये ट्रकें मुंबई, अलीगढ़, कोलकाता से लेकर चेन्नई तक जाते थे। मतलब इस छोटे से कस्बे से ट्रकों की आवाजाही पूरे देश में होती थी और इनका माल देश की चारों दिशाओं तक पहुंचाया जाता था। १९९० के दशक में सिमी का जाल देश भर में बढ़ता गया और इसका केंद्र उज्जैन जिले का यही महिदपुर था। २००८ में महिदपुर से कुछ ही दूरी पर उन्हेल में सिमी का प्रशिक्षण केंद्र पकड़ा गया, महिदपुर से कुछ दूरी पर झिरनिया के एक कुएं से हथियारों का जखीरा मिला और उसका संबंध १९९३ में मुंबई में हुए आतंकी हमलों से था। इन धमाकों के मुख्य अभियुक्त दाऊद इब्राहिम को आज तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका है।
पेशेवर
महिदपुर का ही रहनेवाला था सिमी प्रमुख सफदर नागोरी और उन्हेल का रहने वाला था आमिल परवेज। आमिल परवेज को ९ फरवरी २००९ को केरल पुलिस ने इंदौर से गिरफ्तार किया था। इस पर केरल के वेगमन हिल्स पर आतंकी ट्रेनिंग वैंâप लगाने का आरोप था। दरअसल, महिदपुर, झिरनिया या उन्हेल जैसे कस्बे और गांव तक आतंक की स्लीपर सेल को तैयार करने का सिलसिला पाकिस्तान की उस नीति का हिस्सा माने जाते हैं, जिसे ऑपरेशन टुपैक का नाम दिया गया था। ऑपरेशन टुपैक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में धार्मिक अलगाव की भावनाएं भड़काकर भारत को अस्थिर करना था। भारत की विविधता का फायदा उठाकर आईएसआई ने आतंकी और अलगाववादी संगठनों, धर्म गुरुओं और कट्टरपंथी ताकतों से हाथ मिलाया। इस तरह वे भारत के कई क्षेत्रों में स्लीपर सेल बनाने में कामयाब हो गए।
बेहद पढ़ी-लिखी डॉक्टर शाहीन, आयशा जान और सादिया। इन तीनों महिलाओं का संबंध खतरनाक हथियारों और गहरी आतंकी साजिश से रहा है। खास बात यह है कि सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ में आने से पहले किसी को अंदाजा भी नहीं था कि अच्छे परिवारों से संबंध रखनेवाली ये शख्स आतंकियों की स्लीपर सेल का हिस्सा हैं। दरअसल, वैश्विक स्तर पर पेशेवर और कट्टरवादी आतंकी संगठनों को वह महारत हासिल है कि वे सामान्य जीवन जीने वाले लोगों की ऐसी पौध तैयार करते हैं, जिनका निजी जीवन और आतंकवादी भूमिका अलग-अलग होती है। ये लोग वर्षों तक सामान्य नागरिकों की तरह रहकर छिपे रहते हैं। उनका उद्देश्य होता है आदेश मिलने पर अचानक आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना। ये सेल आतंकवाद का सबसे खतरनाक और पकड़ में न आने वाला रूप माने जाते हैं। लंबी अवधि तक छिपकर रहकर किसी समय सक्रिय होनेवाले कार्यकर्ता या ग्रुप का मनोविज्ञान किस तरह काम करता है,यह जानना हैरान कर देता है। ये सामान्य जीवन जीने वाले लोग होते हैं।
नेटवर्क
मसलन डॉ. शाहिदा के पूर्व पति का कहना है कि वह बेहद उदार समाज का हिस्सा बनकर रहती थी और इस्लामिक कट्टरता जैसी कोई चीज उसमें थी ही नहीं, जबकि वास्तविकता इससे अलग निकली। २०१८ में पुलिस ने २८ वर्ष की आयशा जान को २० ग्रेनेड के साथ श्रीनगर के बाहरी इलाके लावापोरा से पकड़ा था। आयशा आतंकियों को हथियार व गोला-बारूद सप्लाई करती थी और उसके पास से खतरनाक हथियार बरामद भी हुए थे। २०१८ में ही गणतंत्र दिवस को निशाना बनाने की साजिश रचनेवाली सादिया को दक्षिण कश्मीर के बिजबेहरा गांव के एक पेइंग गेस्ट से पकड़ा गया था। पुणे के यरवदा के प्रतिष्ठित घरोंदा सोसाइटी में अपने परिवार के साथ रहनेवाली सादिया पर सुरक्षा एजेंसियां नजर रखे हुए थी। वर्ष २०१५ में महज १५ वर्ष की सादिया महाराष्ट्र एटीएस के रडार पर आई जब उसने लगातार सोशल साइट पर आईएसआई से नजदीकियां बढ़ाना प्रारंभ किया था। फेसबुक, व्हॉट्सऐप, टेलीग्राम, ट्विटर जैसी सोशल साइटों से जुड़कर सादिया आतंक का नेटवर्क तैयार कर रही थी। उसके फेसबुक मित्रों में फिलीपींस, सऊदी अरब, केन्या, श्रीलंका और भारत के कई राज्यों के लोग शामिल थे।
भारत में कई बार ऐसे स्लीपर सेल उजागर हुए हैं, जो विदेशी आतंकी संगठनों से जुड़े पाए गए। ये नेटवर्क समाज में घुल-मिलकर स्थानीय युवाओं को गुमराह भी करते हैं। सुरक्षा एजेंसियां डिजिटल निगरानी, खुफिया जानकारी और समुदाय की सहायता से इन्हें पकड़ने का प्रयास करती हैं। राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक पहचान का फायदा उठाकर ये लोग दूसरों से जुड़ते हैं और उनमें घुलमिल जाते हैं। यह समूह-आधारित पहचान बाद में हिंसा-समर्थन के लिए मनोवैज्ञानिक आधार देती है। इस सेल का इस्तेमाल जासूसी, आतंकवाद या अन्य गुप्त अभियानों के लिए किया जाता है। इस रणनीति का उद्देश्य पुलिस या अन्य विरोधी समूहों के लिए उन्हें पकड़ना मुश्किल बनाना है, क्योंकि वे किसी भी प्रकार के असामान्य व्यवहार में शामिल नहीं होते हैं।
मजदूर,रसोइये, ट्रक ड्राइवर से लेकर डॉक्टर और प्रोफेसर तक, स्लीपर सेल के सदस्य अक्सर गुप्त-तरीके से एक-दूसरे के साथ संपर्क में रहते हैं, जिससे किसी को भनक नहीं लगती और वे अपनी योजना पर आगे बढ़ते रहते हैं। इसमें स्थानीय लोग शामिल हो सकते हैं, जिससे देश, काल और स्थितियां समझने में आसानी होती है तथा आवश्यक जानकारी और समर्थन भी मिल जाता है। स्लीपर सेल के पास हथियार, विस्फोटक और अन्य उपकरण उपलब्ध होते हैं, जिससे मौका मिलते ही वे हमलों के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं या पहले से प्राप्त कौशल का अभ्यास कर सकते हैं।
खतरनाक
भारत में ऐसी कई आतंकी घटनाएं हुईं हैं जब आतंकी हमलों के पहले आतंकी संभावित लक्ष्यों की पहचान कर कई महीनों तक वहां रुके, घूम फिर कर आवश्यक जानकारियां जुटाईं। सुरक्षा प्रोटोकॉल और गतिविधियों के पैटर्न का अध्ययन किया, जिससे उन्हें संभावित हमलों के लिए सही समय और स्थान चुनने में मदद मिली। स्लीपर सेल की कार्यप्रणाली यह दर्शाती है कि आतंकवादी समूह अपनी योजनाओं को अंजाम देने के लिए गुप्तता और समय का सही उपयोग वैâसे करते हैं। यह उनकी सक्रियता को पहचानने और रोकने के लिए सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक चुनौती बनाता है। देश में कई कुख्यात आतंकी हमलों में शामिल जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, सिमी, इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकी समूहों ने विभिन्न राज्यों में स्लीपर सेल बनाएं हैं। ये बेहद सुनियोजित तरीके से स्थानीय युवाओं को प्रभावित करते हैं और उन्हें आतंकवादी गतिविधियों के लिए भर्ती करते हैं। कुछ स्लीपर सेल जातीय या धार्मिक पहचान का उपयोग करके अपने लक्ष्यों को साधने का प्रयास करते हैं। ये अक्सर एक विशेष समुदाय के भीतर से सदस्यों को शामिल करते हैं।
आतंकी संगठन लंबे समय तक योजना बनाकर ऐसे नौजवानों को निशाना बनाते हैं, जिनके मन में धार्मिक असंतोष, बेरोजगारी या पहचान का संकट होता है। भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुभाषाई देश में धार्मिक गुरुओं के आह्वान पर हजारों लोगों का अचानक इकट्ठा हो जाना बेहद खतरनाक संकेत है। यह देखने में आया है कि स्लीपर सेल में धर्मगुरुओं का खास रोल होता है, जो धार्मिक अत्याचार की कपोल-कल्पित कथाओं के जरिए गुमराह करते हैं। समर्थकों को धार्मिक भावनाओं के नाम पर भड़काया जाता है। प्रचार और झूठे धार्मिक संदेशों के जरिए उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे किसी पवित्र मिशन का हिस्सा हैं। इस तरह धर्म के नाम पर अंधभक्ति और कट्टरता पैâलाकर युवाओं को हिंसा के रास्ते पर धकेल दिया जाता है। ऑनलाइन कट्टरपंथ ने स्लीपर सेल को मजबूत किया है, जिससे आतंकी संगठनों के लिए दूरियां कोई मायने नहीं रखती।
यह तथ्य भी सामने आए हैं कि स्लीपर सेल का किसी एक संगठन से संबंध नहीं होता। तहरीक-ए-अहया-ए-उम्मत, खैर-ए-उम्मतट्रस्ट, तहरीक-तलाबा-ए-अरबिया, तहरीक तहफ्फुज-ए-शायर-ए-इस्लाम और वहदत-ए-इस्लामी। भारत सरकार ने इन संगठनों को सिमी का मुखौटा कहा है। जाहिर है प्रतिबंधों से बचने के तरीके से लेकर पहचान छुपाने में माहिर स्लीपर सेल, खतरनाक आतंकी हमलों में सबसे बड़ा मददगार साबित हुआ है। स्लीपर सेल भारत ही नहीं, बल्कि प्रâांस, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में भी सुरक्षा चुनौती बना हुआ है।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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