नरेंद्र शर्मा
राजस्व का लालच कितने घर बर्बाद करेगा?
‘मयकदा…कई घर पी गया’
बंगलुरु के फ्रीडम पार्क में २५ नवंबर २०२५ को हजारों महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हुई थीं। वह कर्नाटक के कोने-कोने से आई थीं इस मुख्य मांग का समर्थन करने के लिए कि शराब पर पाबंदी लगाई जाए और अवैध बिक्री के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए। इस राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन का आयोजन अनेक महिला संगठनों ने संयुक्त रूप से किया था। इस प्रदर्शन में गुन्जाहल्ली, रायचुर से लक्ष्माम्मा भी मौजूद थीं अपने १८-वर्षीय पोते का फोटो लिए हुए, जिसे अब शराब की लत पड़ गई है। उनका कहना है, ‘हर दिन इस डर से आरंभ होता है कि घर का कोई मर्द शराब के नशे में धुत होकर लौटेगा और फिर से हम महिलाओं की पिटाई करेगा।’
खामोश संकट
६२-वर्षीय लक्ष्माम्मा के लिए शराब अमूर्त नीति मुद्दा नहीं है, शराब की वजह से उन्होंने अपने पति को खोया, बेटे को इसकी लत में पड़ते हुए देखा और अब उसी रास्ते पर अपने पोते को चलते हुए देख रही हैं। उनका सवाल है, ‘हम कितने और बच्चों को खोएंगे? शराब तो हमारे परिवारों को जिंदा खा गई है। सरकार को हमारे जैसे परिवारों की सुरक्षा करनी चाहिए और शराब पर पाबंदी लगा देनी चाहिए।’ उनकी बातें सुनकर मैराज पैâजाबादी का शेर सहज ही याद आ गया- ‘मयकदे में किसने कितनी पी खुदा जाने मगर /मयकदा तो मेरी बस्ती के कई घर पी गया।’
पिछले एक दशक से अधिक से चल रहे इस आंदोलन का यह प्रदर्शन नवीनतम अध्याय है, जो दबाव डालनेवाला और बहुत अधिक व्यक्तिगत रहा। शराब की लत सबसे खामोश सामाजिक संकट है इसलिए आंदोलनकारी महिलाएं चाहती हैं कि शराब पर पाबंदी लगे। इस मांग का माना जाना कठिन प्रतीत होता है। यह अनुमान अकारण नहीं। शराब से राज्य सरकारों के पास अच्छा-खासा राजस्व आता है, जिसे वह खोना नहीं चाहतीं। जिन राज्यों में शराबबंदी है जैसे गुजरात व बिहार, उनमें शराब की अवैध बिक्री होती है, नकली शराब से मौतों की अक्सर खबरें सामने आती रहती हैं इसलिए शराबबंदी हटाने की मांग उठती रहती है। दरअसल, प्रतिबंधित फल हमेशा मीठा प्रतीत होता है, जो जब वैध तरीके से नहीं मिलता तो लोग अवैध तरीके से हासिल करने का प्रयास करते हैं। यही वजह है कि कई राज्यों को अपनी शराबबंदी नीति को वापस लेना पड़ा, मसलन हरियाणा को।
बहरहाल, प्रâीडम पार्क में जो गुस्सा देखने को मिला, वह नया नहीं था। तीस से अधिक संगठनों ने मिलकर मद्यनिषेध आंदोलन पिछले लगभग दस वर्षों से चलाया हुआ है। इनके प्रमुख विशाल प्रदर्शन २०१६, २०१८, २०१९, २०२३ और अब २०२५ में हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त छोटे-छोटे प्रदर्शन तालुका व जिला स्तर पर सालभर जारी रहते हैं। इसके बावजूद महिलाओं का कहना है कि कुछ भी परिवर्तन नहीं आया है। लक्ष्माम्मा की आपबीती देशभर की बेशुमार महिलाओं की कहानी है। शराब संबंधी जटिलताओं के कारण उनके पति का निधन सात वर्ष पहले हुआ था। दैनिक दिहाड़ी पर मजदूरी करके उन्होंने अकेले दम पर दो बेटियों व एक बेटे की परवरिश की। वह खेतों पर सुबह से शाम तक मजदूरी करतीं। लेकिन अगली पीढ़ी के साथ शराब की लत ने उनके घर में फिर से प्रवेश किया।
सिर्फ बर्बादी
प्रâीडम पार्क में सिंधनूर से महबूबा फिरदौस भी आई हुई थीं। उनके चार बेटों में से केवल एक ही शराब से दूर रहा। उन्होंने बताया, ‘शराब के नशे में मेरे बेटे मुझे पीटते हैं। कोई पड़ोसी हस्तक्षेप नहीं करता। हम किसके पास जाएं?’ एक अन्य महिला ने अपना दुखड़ा इस तरह से सुनाया, ‘मेरा बेटा शराब पीने के बाद अपनी पत्नी की पिटाई करता था। उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई। इसके बाद भी उसने शराब पीना जारी रखा और एक दिन उसके शरीर ने उसका साथ छोड़ दिया। हमारे पास उसका दाह-संस्कार सही से करने के भी पैसे नहीं थे। अब मेरे पोते को मजदूरी करने के लिए अपना स्कूल छोड़ना पड़ा है। यह सबकुछ कब तक चलता रहेगा?’ महिलाओं ने बताया कि किस तरह शराब ने उन्हें कम आयु में विधवा कर दिया, बच्चों को घर चलाने के लिए मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है, घर कर्ज और गरीबी में डूब जाता है। चाहे लाइसेंस की दुकानें हों या किराने की दुकानें या घरों में बिकती अवैध शराब, हर जगह शराब आसानी से मिलने लगी है, विशेषकर युवा लड़कों के लिए।
प्रâीडम पार्क में प्रदर्शनकारी महिलाओं की मुख्य रूप से दो मांगें थीं, शराब लाइसेंस पर ग्रामसभा के अधिकार को पुन: स्थापित किया जाए और गांव-स्तर की महिला निगरानी समितियां स्थापित की जाएं। हरियाणा, महाराष्ट्र व राजस्थान जैसे राज्यों में ग्रामसभा का निर्णय अंतिम होता है कि उनके कार्य क्षेत्र में शराब की दुकान खुल सकती है या नहीं। लाइसेंस उसी सूरत में जारी किया जाता है जब ग्रामसभा की न्यूनतम संख्या में महिलाएं, अक्सर २० प्रतिशत, प्रस्ताव को मंजूरी दे दें। कर्नाटक में यह प्रावधान २०१६ तक जारी था, जब तत्कालीन सरकार ने उसे हटा दिया। प्रदर्शनकारी महिलाएं इस प्रावधान की बहाली चाहती हैं और वह भी सख्त नियमों के साथ कि १० प्रतिशत ग्रामसभा सदस्यों को अनुमति को वीटो करने का अधिकार दिया ज्ााए जैसा कि कुछ राज्यों में है। इसके अतिरिक्त उनकी यह भी मांग है कि महिला समितियों को शराब का अवैध धंधा कर रहे घरों, किराने की दुकानों, स्टॉल्स या शेड्स बंद कराने का कानूनी अधिकार हो।
राजस्व का लोभ
कर्नाटक पंचायत राज कानून में सामाजिक न्याय के लिए अतिरिक्त समितियां गठित करने का प्रावधान है और इन शक्तियों का विस्तार अवैध शराब बिक्री बंद कराने के लिए किया जा सकता है। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने प्रदर्शनकारी महिलाओं से मुलाकात करने के बाद उनकी मांगों का संज्ञान लेने का आश्वासन दिया है, लेकिन इस सिलसिले में कुछ होना मुश्किल ही लगता है।
शराबबंदी पर अभी तक अनेक सर्वे हो चुके हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-५) के डाटा के अनुसार, शराबबंदी के बाद शारीरिक या भावनात्मक हिंसा का सामना करनेवाली विवाहित महिलाओं का प्रतिशत काफी कम हुआ है। २०२३ के एक सर्वे के मुताबिक, ७० प्रतिशत परिवारों ने माना है कि उनके घर के पुरुषों द्वारा शराब न पीने से उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। अधिकतर महिलाओं ने बताया कि शराब न होने से घर में शांति और सम्मान बढ़ा है। बिहार में ५ अप्रैल २०१६ में शराबबंदी के बाद से शराब की वैध बिक्री लगभग शून्य हो गई है, जिससे खपत में गिरावट भी आई है, लेकिन बिहार में नकली शराब पीने से लोगों की मौतें भी हुई हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने २०२३ में आदेश दिया था कि ‘एक-एक घर में पता करें कि कौन (शराबबंदी के) पक्ष में है और कौन खिलाफ है’। इस सर्वे का क्या हुआ, यह तो मालूम नहीं, लेकिन नितीश कुमार का दावा है कि उनके राज्य में ‘वर्तमान में ९९ प्रतिशत महिलाएं और ९२ प्रतिशत पुरुष शराबबंदी के पक्ष में हैं’ और वह यह कहना भी नहीं भूलते कि ‘चाहे जो हो जाए बिहार ड्राई स्टेट रहेगा’। लेकिन यह सोच अन्य राज्यों में नहीं है, क्योंकि कोई भी शराब से मिलने वाले मोटे राजस्व को छोड़ना नहीं चाहता, भले ही शराब से कितने ही परिवार बर्बाद हो रहे हों। दरअसल, शराबबंदी पर देशव्यापी बहस की जरूरत है और यह भी कि परिवारों को इसके कुप्रभावों से कैसे बचाया जाए।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
