मुख्यपृष्ठस्तंभकोर्ट-रूम: उकसावे की सजा और उसके परिणाम

कोर्ट-रूम: उकसावे की सजा और उसके परिणाम

एड. कनई बिस्वास

कई लोग यह मानते हैं कि यदि उन्होंने खुद अपराध नहीं किया, तो वे सजा से बच जाएंगे। लेकिन कानून केवल अपराध करनेवाले को ही नहीं, बल्कि अपराध करवाने, उकसाने और उसकी योजना बनाने वालों को भी बराबर जिम्मेदार मानता है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), २०२३ की धारा १०९, ११० और १११ इसी प्रकार की जिम्मेदारी और सजा को स्पष्ट करती हैं।
केस स्टडी – १: ‘उकसावे की सजा’ (धारा १०९)
एक व्यक्ति ने अपने साथी को चोरी करने के लिए उकसाया और पूरी योजना तैयार की। साथी ने चोरी कर ली।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी ने अपराध के लिए प्रेरित किया?
क्या उसकी भूमिका अपराध में महत्वपूर्ण थी?
क्या अपराध उसी उकसावे के कारण हुआ?
फैसला- यह अपराध के लिए उकसाने का मामला है। समझें: धारा १०९ के तहत अपराध करवाने या उकसाने वाला व्यक्ति भी मुख्य अपराधी के समान सजा का पात्र हो सकता है।
केस स्टडी – २: ‘अपराध पूरा न होने पर भी जिम्मेदारी’ (धारा ११०)
एक व्यक्ति ने किसी को हमला करने के लिए उकसाया, लेकिन डर की वजह से वह व्यक्ति अपराध नहीं कर पाया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या उकसावा वास्तव में दिया गया था?
क्या अपराध की योजना बनाई गई थी?
क्या आरोपी का उद्देश्य अपराध करवाना था?
फैसला- यह उकसावे का अपराध माना जा सकता है। समझें: धारा ११० के अनुसार, भले अपराध पूरा न हुआ हो, लेकिन अपराध के लिए उकसाना स्वयं में दंडनीय है।
केस स्टडी – ३: ‘अलग परिणाम होने पर जिम्मेदारी’ (धारा १११)
एक व्यक्ति ने अपने साथी को किसी को डराने के लिए भेजा, लेकिन उसने गुस्से में आकर पीड़ित को गंभीर रूप से घायल कर दिया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या परिणाम योजना से अधिक गंभीर था?
क्या ऐसा परिणाम संभव और अनुमानित था?
क्या उकसाने वाले ने स्थिति पैदा की?
फैसला- यह अलग परिणाम के बावजूद जिम्मेदारी का मामला है। समझें: धारा १११ के तहत यदि उकसावे के कारण अपेक्षा से अधिक गंभीर परिणाम हो जाए, तो उकसाने वाला भी उसके लिए जिम्मेदार माना जा सकता है।
भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि अपराध केवल हाथ से नहीं, बल्कि सोच, योजना और उकसावे से भी होता है। कानून के अनुसार, अपराध की पृष्ठभूमि तैयार करनेवाला व्यक्ति भी उतना ही दोषी है जितना अपराध करनेवाला। यानी किसी अपराध के पीछे खड़े रहकर बच निकलना आसान नहीं है।
(अगले अंक में: धारा ११२, ११३ और ११४ – ‘साझा अपराध और सामूहिक जिम्मेदारी’ को आसान उदाहरणों के साथ समझेंगे।)

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