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मगरमच्छ पकड़ने वालों को ‘कॉकरोच’ से डर!

-वोट चोरी के सवालों पर बांग्लादेश का शोर; ज्ञानेश कुमार के बचाव में भाजपा की मोर्चेबंदी क्यों?

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

सवाल चुनाव आयोग से हैं, लेकिन जवाब देने भाजपा मैदान में उतर आई है! कथित वोट चोरी के खिलाफ आवाज उठा रहे छात्रों और युवाओं के आंदोलन को बांग्लादेश की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन की कोशिश बताने का अभियान तेज हो गया है। दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से जुड़ी खबरों के बाद आयोग से स्पष्ट जवाब की जरूरत थी; राजनीतिक आरोपों की बौछार ने विवाद और भड़का दिया है।
यह बयानबाजी सिर्फ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तक सीमित नहीं है। धर्मेंद्र प्रधान ने आंदोलन की आड़ में अराजकता फैलाने का आरोप लगाया है। योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेश की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन और युवाओं को अराजकता का औजार बनाने की बात कही।
इस बेचैनी पर फिल्म कलाकार प्रकाश राज को व्यंग्य सूझता है; बचपन में मगरमच्छ पकड़ने का किस्सा सुनाने वाली राजनीति आज ‘कॉकरोच’ से क्यों डर रही है? युवाओं का आंदोलन इतना महत्वहीन है तो उसके खिलाफ इतने बड़े नेताओं को मोर्चा क्यों संभालना पड़ रहा है? और यदि सवाल गंभीर हैं तो उनका तथ्यपूर्ण उत्तर कहां है? स्मृति ईरानी ने विपक्ष की मंशा पर सवाल उठाते हुए सत्ता परिवर्तन का आरोप लगाया, जबकि संबित पात्रा ने बिना चुनाव लड़े सत्ता हासिल करने की कोशिश बताई। शब्द अलग हैं, राजनीतिक निशाना एक है; आंदोलन की विश्वसनीयता। लेकिन सवाल है; मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों का जवाब बांग्लादेश का नाम लेकर कैसे मिलेगा? विदेशी फंडिंग या देशविरोधी साजिश है तो प्रमाण सामने रखिए। छात्रों की आवाज को संदेह के घेरे में खड़ा कर देने से चुनावी पारदर्शिता के सवाल खत्म नहीं होंगे। देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने की राजनीति से संस्थाओं की साख नहीं बचती।

वोट चोरी के सवालों पर पर्दा क्यों?
ज्ञानेश कुमार को मिल रहे राजनीतिक समर्थन पर आंदोलनकारी भी सवाल उठा रहे हैं। आयोग आरोपों को खारिज करता है और भाजपा विपक्ष पर युवाओं के इस्तेमाल का आरोप लगाती है। मगर राजनीतिक पैरवी, आयोग के अपने स्पष्टीकरण की जगह नहीं ले सकती। ‘दाल में कुछ काला’ होने का संदेह भाषणों से दूर नहीं होगा। जब ‘पूरी दाल काली’ ही काली है। अब भी संदेह मिटाने का रास्ता साफ है; रिकॉर्ड खोलिए, आपत्तियों का जवाब दीजिए और जवाबदेही स्वीकार कीजिए। छात्रों पर आरोपों की बौछार करके कथित वोट चोरी के सवालों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता!
मोदी-शाह की पाबंदी! हिंदुस्थान में तिरंगा न फहराएं!!
देश के चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा पुकारे गए `लहरा दो तिरंगा’ मोर्च से पहले ही जिस तरह से पुलिस ने सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और छात्र नेता नेहा बोरा को हिरासत में ले लिया, उससे यही मैसेज परिलक्षित होता है कि मोदी–शाह मंडली ने हिंदुस्थान में तिरंगा फहराने पर पाबंदी लगा दी है!
गौरतलब है कि इस मार्च को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने सेंट्रल पार्क के इलाके में भारी पुलिस बल डेप्लॉय कर दिया था। अभिजीत दीपके ने तंज कसते हुए कहा कि देश में तिरंगा फहराने पर भी अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पाबंदी लगा दी है। अपने ही देश में अपना ही तिरंगा फहराने की आजादी नहीं बची है। सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका को गिरफ्तार किया गया था। उसी के विरोध में और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के लिए आज तिरंगा मार्च का आह्वान किया गया था। इसके मुताबिक, सैकड़ों युवा सेंट्रल पार्क में इकट्ठा होने लगे थे। हालांकि, मार्च शुरू होने से पहले ही पुलिस ने अभिजीत दीपके और नेहा बोरा को हिरासत में ले लिया। दीपके ने गुरुवार देर रात एक प्रेस कॉन्प्रâेंस की थी। इसके बाद शुक्रवार दोपहर दिल्ली पुलिस की एक टीम उनके ठहरने की जगह पर नोटिस लेकर पहुंची। जैसे ही दीपके सेंट्रल पार्क जाने के लिए घर से बाहर निकले, पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।
`ये तो सरासर तानाशाही है’
अभिजीत दीपके को हिरासत में लिए जाने पर आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे तानाशाही करार दिया है। केजरीवाल ने कहा है कि `ये तो सरासर तानाशाही है। क्या तिरंगा लहराना जुर्म है? अभिजीत की गिरफ्तारी दिखाती है कि मोदी जी इनसे कितने डरते हैं। हम अपने देश में तिरंगा नहीं लहरायेंगे तो क्या पाकिस्तान में लहराएंगे, जिन्हें भारतीय तिरंगे से परेशानी है, वो पाकिस्तान चले जाएं।’

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