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संपादकीय : भाजपा का तिरंगा विरोध दिमागी राष्ट्रद्रोही!

भारतीय जनता पार्टी और तिरंगे का संबंध बहुत देर से आया। भाजपा की मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वतंत्रता के बाद ५२ वर्षों तक अपने मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया था। संघ की शाखाओं, सम्मेलनों, परेड जैसे आयोजनों में भी तिरंगा नहीं फहराया जाता था। इसीलिए उस सांचे से निकली पीढ़ी को तिरंगे के प्रति श्रद्धा और आत्मीयता होने का कोई कारण नहीं है। यही वजह है कि दिल्ली में `कॉकरोच’ लड़कों ने `जंतर-मंतर’ पर जाकर जब तिरंगा फहराया, तब उस संगठन के प्रमुख पदाधिकारियों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया। अब `जंतर-मंतर’ को आंदोलन का स्थान सरकार द्वारा रद्द किए जाने की पृष्ठभूमि में `कॉकरोच’ लड़कों ने दिल्ली के `कनॉट प्लेस’ इलाके के सेंट्रल पार्क में `लहरा दो तिरंगा’ मोर्च का आयोजन किया है, तो अमित शाह और उनकी पुलिस को उससे भी तकलीफ हो रही है। दिल्ली महानगरपालिका पर दबाव बनाकर `सेंट्रल पार्क’ पार्क पर दो दिनों के लिए ताला ठोक दिया गया और तिरंगा यात्रा न निकल सके, इसलिए कार्यकर्ताओं की धर-पकड़ शुरू कर दी गई। तिरंगा फहराने वालों पर पुलिस बल का प्रयोग किया गया। सरकार की ओर से कहा गया कि तिरंगा मार्च से स्थानीय व्यापारियों का आर्थिक नुकसान होगा और यातायात बाधित होगा। मोदी जो समय-समय पर दिल्ली, गुजरात और कई राज्यों में जाकर
सड़कों पर खेल
खेलते हैं, उसे `रोड शो’ कहा जाता है। उससे जो यातायात बाधित होता है और लोगों को परेशानी होती है, उसका क्या? फिर लड़कों ने एक दिन `लहरा दो तिरंगा’ यात्रा निकाल ली तो क्या बिगड़ गया? देशभक्ति का ठेका क्या सिर्फ मोदी-शाह और उनके स्वामित्व वाली भाजपा ने ले रखा है? राजनीतिक लाभ के लिए भाजपा ने `हर घर तिरंगा’ जैसा अभियान सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय के माध्यम से चलाया। स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अवसर पर नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों, इमारतों और सार्वजनिक स्थानों पर तिरंगा फहराने की प्रेरणा दी। कहा गया कि इससे देशभक्ति और एकता की भावना मजबूत होगी, लेकिन `हर घर तिरंगा’ वालों को `जंतर-मंतर’ और `कनॉट प्लेस’ पर तिरंगा फहराया जाना पसंद नहीं है, यह आश्चर्यजनक है। तिरंगा मोदी आदि लोगों की निजी संपत्ति नहीं है। वह सिर्फ कपड़े का टुकड़ा नहीं है। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, संघर्ष और बलिदान की गाथा है। २२ जुलाई १९४७ को संविधान सभा ने तिरंगे को स्वीकार किया। १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्र भारत में वह पहली बार फहराया गया। संविधान के अनुच्छेद ५१ (ए) के अनुसार प्रत्येक नागरिक को
राष्ट्रीय ध्वज का आदर
करना ही चाहिए। २००२ की ध्वज संहिता के अनुसार, नागरिक अपना तिरंगा सम्मान के साथ फहरा सकते हैं। ऐसा होते हुए भी भाजपा के सत्ताधीश तिरंगा फहराने वालों को गिरफ्तार करके जेल में डालते हैं, इसे ब्रिटिश हुकूमत के पुनरागमन का ही लक्षण माना जाना चाहिए।
`विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बरसाने वाला,
प्रेम सुधा सरसाने वाला,
वीरों को हर्षाने वाला,
मातृभूमि का तन-मन सारा।।’
ऐसा हम अभिमान से गाते हैं। ऐसे तिरंगे का यदि स्वतंत्र हिंदुस्थान की भूमि पर कोई विरोध कर रहा हो, तो वह देशद्रोह जैसा अपराध है। `लहरा दो तिरंगा’ आंदोलन न करने की नोटिस जारी करके केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपना असली चेहरा देश को दिखा दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन में शामिल होने के कारण अभिनेता इमरान खान को भारत छोड़ने का आदेश मुंबई पुलिस ने दिया, तो दिल्ली में `तिरंगा’ मत फहराओ ऐसा रुख दिल्ली पुलिस ने अपनाया। यह दयनीय प्रकार है। भारत में शासकों द्वारा ही तिरंगे का विरोध करना सिरफिरेपन का लक्षण है। मोदी आदि कंपनी लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन करने वालों को `दिमागी नक्सल’ कहती हैं, लेकिन तिरंगे का विरोध करने वालों को `दिमागी राष्ट्रद्रोही’ कहना पड़ेगा!

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