-तौसीफ कुरैशी
-गांधीगिरी और दलाल-ए-फिरंग की रुख्सती!
राहुल गांधी और समूचा विपक्ष आज उस जद्दोजहद में मुब्तिला है, जिसका सीधा-सा मतलब है,भारत को भारत ही रहने दिया जाए। लोकतंत्र को लोकतंत्र, वोट को वोट और विरोध को विरोध रहने दिया जाए। सत्ता से सवाल पूछने वाले को देशद्रोही और सवालों से डरने वाली सत्ता को देशभक्त मानने का यह उलटा हिसाब अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है। बीते १० अक्टूबर को जेन-जी ने भी जंतर-मंतर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर अपना जलवा दिखा दिया। यानी मामला अब केवल नेताओं की सभाओं और संसद की बहसों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस युवा पीढ़ी तक पहुंच गया है, जिसे सत्ता ने सबसे कम गंभीरता से लिया था। यही पीढ़ी जब सड़क पर उतरती है, तो हुकूमत को यह समझना चाहिए कि मामला सिर्फ नाराजगी का नहीं, बल्कि भविष्य की चिंता का है।
विपक्ष का प्रदर्शन और कूटनीतिक दबाव
अब आते हैं असल मुद्दे पर। राजघाट पर होने वाले विपक्ष के प्रदर्शन को रोकने की कोई खास कोशिश नहीं की गई। सवाल यह है, क्यों? क्या अचानक सत्ता को गांधी याद आ गए? क्या अहिंसा से मोहब्बत जाग गई? या फिर बात कुछ और है? सियासत में कई बार जो दिखाई देता है, असली कहानी उसके पर्दे के पीछे होती है।
दिल्ली में विपक्ष के प्रदर्शन को रोकना सत्ता के लिए आसान था। बैरिकेड लगते, पुलिस आती, धक्का-मुक्की होती, गिरफ्तारियां होतीं और फिर वही तस्वीरें दुनिया भर के अखबारों में छपतीं। लेकिन इस बार सत्ता ने यह हिसाब लगाया कि लाठी चलाकर लोकतंत्र बचाने का दावा करना दुनिया को कुछ ज्यादा ही हास्यास्पद लगेगा। आज दुनिया सब देख रही है। कई मुल्क इस इंतजार में बैठे हैं कि जैसे ही हुकूमत विपक्ष के रहनुमाओं को रोकने या उन पर कोई ज्यादती करती है, वे भारतीय राजदूतों को तलब कर लें, डोजियर मेज पर रखें और अपनी चिंताएं दर्ज कराएं।
गांधीगिरी की ताकत और सत्ता का सबसे बड़ा डर
जब हम जैसे आम नागरिकों को यह अहसास होने लगा है, तो हुकूमत को भी यह बात समझ आ ही गई होगी कि मामला सिर्फ दिल्ली की एक सड़क का नहीं है। आज सूचनाएं दीवारों को फांदकर नहीं, बल्कि दीवारों को ही गायब करके आती हैं।
इसलिए, आज की ‘गांधीगिरी’ को कमजोरी समझने की भूल बिल्कुल न करें। महात्मा गांधी की असली ताकत यही थी कि वे सत्ता के हथियारों से नहीं, बल्कि जनता के आत्मबल से लड़ते थे। सामने वाला चाहे जितनी ताकत लगा ले, अगर जनता ने हिंसा का रास्ता छोड़कर अन्याय के सामने शांति से डटे रहना सीख लिया, तो सत्ता का सबसे बड़ा हथियार यानी ‘भय’ खत्म हो जाता है। और यही डर सत्ता के लिए सबसे बड़ा डर है।
चारों तरफ से घेराबंदी हो चुकी है और ऊपर से गांधी की जमीन पर ‘गांधीगिरी’! सत्ता के लिए इससे मुश्किल दृश्य और क्या हो सकता है कि जिसे वह रोकना चाहती है, वह हाथ में पत्थर नहीं बल्कि संविधान लेकर खड़ा है; जिसे वह डराना चाहती है, वह कह रहा है कि हम डरेंगे नहीं; और जिसे वह खामोश करना चाहती है, वह गांधी की समाधि पर जाकर बस इतना कह रहा है,भारत को भारत रहने दो।
अब देखना यह है कि सत्ता इस गांधीगिरी को समझती है या इसे अपनी मजबूरी मानकर कोई नई गलती करती है। इतिहास गवाह है कि सत्ता की रुख़्सती अक्सर उस दिन शुरू नहीं होती जिस दिन वह चुनाव हारती है, बल्कि उस दिन शुरू होती है, जिस दिन जनता उससे डरना बंद कर देती है।
हम भी देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे!
हर-हर… घर-घर… सत्यमेव जयते
