मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : तब की बात, अब क्यों करना बंधु!

तरकश : तब की बात, अब क्यों करना बंधु!

-धनुरर्धर

लो, खुल गई विरोधियों की पोल। उस दिन प्रेस क्लब आए थे पूरी तैयारियों के साथ कि प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे और सरकार की धज्जियां उड़ा देंगे। आए और सरकार के खिलाफ शिकायतों-आरोपों की झड़ी भी लगा दी, लेकिन सरकार तो सरकार है। वह भी कोई ऐसी-वैसी नहीं मोदी जी की सरकार। उसके अलग-अलग मुंह ही नहीं, अनेकानेक दृश्य-अदृश्य हाथ भी हैं।
कितने मुंह, कौन गिने
कहने वाले तो कहते हैं कि मुंहों की संख्या दस है। लेकिन सच यह है साहब कि मैंने गिना नहीं है। इसलिए ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि मुंह कितने हैं। यह जरूर कह सकता हूं कि चाहे जितने भी हों, इन मुंहों से यह सरकार एक ही समय में अलग-अलग तरह की बातें कर सकती है। अक्सर करती रहती है। विरोधियों की आधी ताकत तो इन्हीं परस्परविरोधी बातों की गुत्थी सुलझाने में खर्च हो जाती है।
हाथों की करामात
बाकी बची ताकत को हाथों की करामात खत्म कर देती है। चूंकि इसके कुछ हाथ दिखते हैं और कुछ नहीं दिखते, सो विरोधी समझ ही नहीं पाते कि जिन हाथों की मार उन्हें झेलनी पड़ रही है, वे वाकई सरकार के हैं या किसी और के। इसी का एक उदाहरण उस दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में मिल गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस को कवर करने पत्रकार बड़ी संख्या में आए थे। इन्हीं में एक वह था जिसने खेल कर दिया।
असली मकसद
ज्यादा कुछ मेहनत भी नहीं करनी पड़ी उसे। आते ही शुरू हो गया। सवालों के फ्रेम में आरोप दागने लगा… आप चाहते क्या हैं, देशद्रोही वाला काम क्यों कर रहे हैं, भारत को बांग्लादेश क्यों बनाना चाहते हैं, आपका असली मकसद क्या है, क्या यह सच नहीं कि आप देश में सरकार बदलना चाहते हैं…।
निज प्रभु कर काजा
इसके बाद उसे धकियाकर वहां से बाहर निकाल दिया गया। और धकियाया भी किसने, प्रेस क्लब की संचालन कमिटी के लोगों ने। आखिर यह आदमी प्रेस क्लब प्रांगण में आयोजित एक कार्यक्रम को बाधित कर रहा था। लेकिन उसे धकियाए जाने का कोई गम नहीं था। चेहरे पर शर्म, अपमान, गुस्से की कोई छाया न थी। ‘मोहि न कछु बांधे कइ लाजा, कीन्ह चहऊं निज प्रभुकर काजा।’ अपने प्रभु के काम को अंजाम देने के लिए वह आया था और देकर वहां से निकल गया। आप कहेंगे निकाला गया, लेकिन इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।
रेजीम चेंज का सवाल
असल बात यह थी कि उसे वह फुटेज मिल गया था जिसे उसका चैनल दिन भर चलाता रहने वाला था। इस रिपोर्टर के खेल का ही एक असर यह भी हुआ कि बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस पर ‘रेजीम चेंज’ वाले सवाल की छाया रही और एक मोमेंट ऐसा भी आया जब सीनियर वकील साहब ने गुस्से में यह एलान ही कर दिया कि हां, हम रेजीम चेंज करना चाहते हैं और करके रहेंगे।
यह समय मामूली नहीं
इन सबके पीछे हाथ किसका था, कैसा था और कितना था, जैसे सवालों को छोड़िए, यह देखिए कि काम तो सरकार का बना है। इसके बाद से ही सरकार के सारे मुंह एक साथ बोल रहे हैं और सब एक ही बात कर रहे हैं। वैसे यह भी कम बड़ा आश्चर्य नहीं कि इस सरकार के सारे मुंह एक बात बोलने लग जाएं। ऐसा बहुत कम होता है और इससे भी यह पता चलता है कि यह समय मामूली नहीं है।
विरोध के पीछे
बहरहाल, सरकार के सभी मुंह कह रहे हैं कि हम तो पहले ही कहते थे इन विरोधियों की असली मंशा कुछ और है। ये भले ही वोट चोरी का मुद्दा उठाएं या ज्ञानेश कुमार का या फिर नीट पेपरलीक का-असल में इनका मकसद है सरकार बदलना। ये बस मोदी सरकार को सत्ता से हटाना चाहते हैं। यही बात आखिरकार वकील साहब के मुंह पर आ गई और पोल खुल गई इन सबकी।
गलत क्या है
अब वकील साहब ही नहीं सारे विरोधी कह रहे हैं कि हां, हम सरकार बदलना चाहते हैं तो उसमें गलत क्या है? क्या लोकतंत्र में सरकार बदलना सामान्य बात नहीं है? चुनाव इसीलिए तो होते हैं कि लोग चाहें तो वोट के जरिए सरकार बदल दें। हमने ये कब कहा कि हम हिंसक तरीकों से सरकार बदलेंगे, हम तो शांतिपूर्ण तरीकों से सत्तापरिवर्तन की मुहिम में लगे हैं।
तब की बात
यह क्या, आपके चेहरे का रंग भी बदल रहा है। आपकी आंखों में भी वही सवाल आ गया है जो विरोधियों की जबान पर है। शायद आप भी यह कहना चाहते हैं कि जब हम विरोध में थे, तब हम भी तो सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे थे। पर भाई, वह तो तब की बात थी। आप अब की बात करें वरना आपकी नीयत पर भी सवाल उठेगा। यह संदेह जगेगा कि कहीं आप सचमुच के लोकतांत्रिक तो नहीं हो गए हैं।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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