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जन्म के समय शिशु का रोना जच्चा-बच्चा के लिए सकारात्मक संकेतः प्रो. एनके. सिंह

तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज एवं रिसर्च सेंटर में एनआरपी दिवस पर बाल रोग विभाग और नवजात शिशु इकाई की ओर से नवजात शिशुओं की आपातकालीन देखभाल एवं पुनर्जीवन कार्यक्रम
खास बातें
* ऐसे कार्यक्रम नवजात शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में सहायकः प्रो. प्रीथपाल मटरेजा
* शिशुओं की सुरक्षित देखभाल के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी आवश्यकः डॉ. रूपा सिंह
* प्रो. बीके गौर ने बताया शिशुओं के जीवन रक्षण में गोल्डन मिनट का महत्व
* बाल रोग, स्त्री रोग, एनेस्थीसिया विभाग एवं नर्सिंग स्टाफ के 40 प्रतिभागी प्रशिक्षित
तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के मेडिकल कॉलेज एवं रिसर्च सेंटर के प्राचार्य प्रो. एनके. सिंह ने कहा कि जन्म के तुरंत बाद शिशु का रोना उसके स्वस्थ होने का महत्वपूर्ण संकेत है। यदि जन्म के समय शिशु रोता है, तो यह मां और शिशु दोनों के लिए एक सकारात्मक संकेत होता है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि शिशु की श्वसन प्रक्रिया सही प्रकार से कार्य कर रही है। वहीं, यदि शिशु जन्म के बाद नहीं रोता है, तो तत्काल नवजात पुनर्जीवन की आवश्यकता पड़ सकती है।
उन्होंने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को आपातकालीन परिस्थितियों में प्रभावी एवं त्वरित उपचार प्रदान करने में सक्षम बनाते हैं। प्रो. सिंह तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज एवं रिसर्च सेंटर में एनआरपी दिवस पर बाल रोग विभाग और नवजात शिशु इकाई की ओर से आयोजित नवजात शिशुओं की आपातकालीन देखभाल एवं पुनर्जीवन कार्यक्रम-एनआरपी के महत्व पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नवजात शिशुओं के जन्म के तुरंत बाद उत्पन्न होने वाली जटिल परिस्थितियों में समय पर प्रभावी पुनर्जीवन तकनीकों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा चिकित्सकों एवं नर्सिंग कर्मियों को प्रशिक्षित करना था। इस अवसर पर विशेषज्ञों द्वारा नवजात पुनर्जीवन के नवीनतम दिशानिर्देशों, आपातकालीन प्रबंधन एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण सत्रों का आयोजन भी किया गया।
मेडिकल के उप-प्राचार्य प्रो. प्रीथपाल सिंह मटरेजा ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा के साथ-साथ कौशल आधारित प्रशिक्षण समय की आवश्यकता है। इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, बल्कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को कम करने में भी सहायक सिद्ध होते हैं।
बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. रूपा सिंह ने कहा कि नवजात शिशुओं की सुरक्षित देखभाल के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने बताया कि एनआरपी प्रशिक्षण जन्म के तुरंत बाद उत्पन्न होने वाली आपातकालीन परिस्थितियों में शिशु के जीवन की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कोर्स कोऑर्डिनेटर प्रो. बीके गौर ने बताया कि एनआरपी दिवस पर नवजात शिशुओं के जीवन रक्षण में गोल्डन मिनट के महत्व और समय पर पुनर्जीवन के प्रभावी तरीकों की विस्तृत जानकारी दी गई। बेसिक एनआरपी कोर्स में प्रतिभागियों को नवजात शिशुओं के पुनर्जीवन की चरणबद्ध प्रक्रिया, वायुमार्ग प्रबंधन, बैग और मास्क वेंटिलेशन तथा आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने की तकनीकों का प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
इस अवसर पर डॉ. एनएस चिथंबरम, डॉ. शलभ अग्रवाल, डॉ. विवेक त्यागी आदि बतौर प्रशिक्षक उपस्थित रहे। कार्यक्रम में बाल रोग विभाग, प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग, एनेस्थीसिया विभाग समेत नर्सिंग स्टाफ के कुल 40 प्रतिभागियों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

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