मुख्यपृष्ठस्तंभसम-सामयिक : बिहार विधानसभा चुनाव-२०२५ : महिला मतदाताओं के लिए महाभारत!

सम-सामयिक : बिहार विधानसभा चुनाव-२०२५ : महिला मतदाताओं के लिए महाभारत!

शाहिद ए चौधरी

बिहार में लगभग सभी राजनीतिक दलों ने विधानसभा चुनाव जीतने के लिए चांद देने का वादा किया है, लेकिन उन्हें टिकट व प्रतिनिधित्व न के बराबर ही दिया है। यह महिलाओं के प्रति वैâसी चिंता है? महिलाओं को अपने खेमे की ओर आकर्षित करने के लिए राजद के तेजस्वी यादव ने जीविका दीदीयों, जो सेल्फ-हेल्प गुटों के साथ काम करती हैं, को स्थाई नौकरियां और ब्याज रहित ऋण देने का वायदा किया है, जबकि एनडीए इस बात का प्रचार कर रहा है कि उसने महिलाओं को मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत एकमुश्त १०,००० रुपए ट्रांसफर किए हैं और वह सभी सरकारी नौकरियों में उन्हें ३३ प्रतिशत आरक्षण देगा व जीविका दीदीयों को ऋण पर ब्याज सब्सिडी देगा। महिलाओं से यह बड़े-बड़े वायदे करने के बावजूद सियासी पार्टियों ने महिलाओं को टिकट के नाम पर खानापूर्ति ही की है। किसी ने भी उन्हें अपने ३३ प्रतिशत टिकट नहीं दिए हैं, जबकि इस संदर्भ में संसद में कानून बनाया जा चुका है, जोकि २०२९ से लागू होगा। राजद ने १४३ सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित किए हैं, जिनमें से मात्र २४ (१६.७८ प्रतिशत) ही महिलाएं हैं। कांग्रेस के अपने ६१ उम्मीदवारों में से केवल ५ महिलाएं (८.६१ प्रतिशत) हैं। जनता दल (यू) व भाजपा के १०१-१०१ उम्मीदवारों में १३-१३ महिलाएं (१२.८७ प्रतिशत) हैं। एलजेपी-आर ने ६ महिलाओं को टिकट दिए हैं, जिनमें से एक का पर्चा अनियमितताओं के कारण रद्द हो सकता है, जिसके खिलाफ अपील की गई है।
कुल मिलाकर २४३ सदस्यों की विधानसभा में एनडीए ने ३५ महिलाओं (१४.४० प्रतिशत) को टिकट दिए हैं और इंडिया गठबंधन ने ३२ महिलाएं (१३.१६ प्रतिशत) महिलाओं को मैदान में उतारा है। गौरतलब है कि बिहार में पिछले सात दशकों में सबसे ज्यादा महिला विधायक (३४) २०१० की विधानसभा में थीं। महिलाओं की भलाई व प्रगति की बहुत बड़ी-बड़ी बातें राजनीतिक पार्टियां करती हैं, लेकिन जब उन्हें उचित प्रतिनिधित्व देने की बात आती है तो सब को सांप सूंघ जाता है। जब उन्हें उनकी संख्या के अनुपात में टिकट ही नहीं दिए जाएंगे तो सियासत में उनका सही प्रतिनिधित्व वैâसे संभव हो सकेगा? बिहार में लगभग ४७ प्रतिशत महिला मतदाता हैं, उनका वोट लेने के लिए घमासान है और उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन दिए जा रहे हैं, लेकिन उनको सत्ता में भागीदार बनाने में आना-कानी है। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि ८ सितंबर २०१७ को बिहार विधानसभा में सभी पार्टियों की महिला विधायकों ने एकजुट होकर अपने अधिकारों की मांग की थी कि उन्हें विधानसभा व संसद में ५० प्रतिशत आरक्षण चाहिए, लेकिन आठ साल बाद भी उनकी यह मांग ठंडे बस्ते में ही पड़ी है और इसके लिए राजनीतिक पार्टियों के मठाधीश ही जिम्मेदार हैं।
निर्णायक
बिहार में महिलाओं की जनसंख्या ४७.८५ प्रतिशत (२०११ जनगणना) है, लेकिन पिछले तीन चुनावों के दौरान देखने में यह आया है कि उनका मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में काफी अधिक रहा है। यही वजह है कि राजनीतिक पार्टियां उन्हें अपना मुख्य आधार मानती हैं और उन्हें आकर्षित करने का प्रयास करती हैं। साल २०२० के विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में अधिक मतदान किया था, जहां पुरुषों का मतदान प्रतिशत ५४.६८ प्रतिशत था, वहीं महिलाओं के लिए यह ५९.६९ प्रतिशत था। २०२४ के लोकसभा चुनाव में यह अंतर ६.५ प्रतिशत के पास पहुंच गया। पुरुष मतदान ५३ प्रतिशत था और महिला मतदान ५९.४५ प्रतिशत था। सवाल यह है कि क्या इस बार भी बिहार में महिलाएं निर्णायक होंगी? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो हमेशा की तरह महिलाओं पर ही अपने चुनाव का दांव लगाए हुए हैं। महिला रोजगार योजना के तहत १.४ करोड़ महिलाओं को १०,००० रुपए प्रति महिला देने से पहले उन्होंने बुजुर्गों की पेंशन में वृद्धि की थी और जीविका दीदीयों के लिए भी इंसेंटिव की घोषणा की थी कि दसवीं कक्षा पास करने के बाद १०,००० रुपए का इंसेंटिव बढ़ाकर २५,००० रुपए कर दिया जाएगा।
इसी प्रकार २५,००० रुपए के प्रेरणा फंड को ग्रेजुएट होने पर बढ़ाकर ५०,००० रुपए कर दिया गया। पंचायती राज संस्थाओं व शैक्षिक संस्थाओं में महिलाओं को ५० प्रतिशत आरक्षण दिया गया और सरकारी जॉब्स में ३५ प्रतिशत आरक्षण का वायदा किया गया। राजद भी ‘माई-बहन योजना’ का वायदा कर रही है, जिसके तहत प्रत्येक महिला को २,५०० रुपए प्रति माह दिए जाएंगे। इन घोषणाओं व वादों के बावजूद बिहार में महिलाओं का राजनीतिक सत्ता में प्रतिनिधित्व चिंताजनक ही रहा है। वर्तमान विधानसभा में मात्र १०.७० प्रतिशत महिला सदस्य हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि २०२० के विधानसभा चुनाव में २४३ सीटों पर से केवल २६ महिलाएं ही चुनी गईं थीं, जोकि २०१५ की विधानसभा से भी कम थीं, जिसमें २८ महिला विधायक (११ प्रतिशत) थीं। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है २०१० में सबसे ज्यादा ३४ महिला विधायक (१४ प्रतिशत) थीं। इससे मालूम होता है कि महिला विधायकों की संख्या में निरंतर गिरावट आयी है।
संकोच
बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनावी सियासत में हिस्सा लेने की दिलचस्पी महिलाओं में लगातार बढ़ती जा रही है। बिहार के २०१० के विधानसभा चुनाव में ३०७ महिलाएं मैदान में थीं, अपनी किस्मत आजमाने के लिए और इस संख्या में निरंतर इजाफा हुआ है। इसके बावजूद विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ नहीं सका है, क्योंकि मुख्यधारा की पार्टियों ने उन्हें अपना टिकट देने में संकोच जारी रखा है।

अधिकतर महिलाएं आजाद उम्मीदवार होती हैं या उन छोटी पार्टियों की प्रत्याशी जिनका जनाधार कुछ खास नहीं है। फिर आजकल चुनाव पैसे वालों का हो गया है, जिसकी कमी की वजह से महिलाएं मजबूती के साथ चुनाव नहीं लड़ पातीं। बीजेपी नारी शक्ति वंदन कानून, जिसके तहत महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण संसद व विधानसभाओं में है और जो २०२९ से लागू होगा, को अपनी मुख्य उपलब्धि के तौर पर पेश करती है, लेकिन जब महिलाओं को टिकट देने की बात आती है तो वह भी ‘जिताऊ प्रत्याशी’ का बहाना बनाकर अपने पैर खींच लेती है। नतीजतन महिलाओं के लिए सीट मात्र प्रतीक बनकर रह जाती हैं और अक्सर प्रभावी या बाहुबली नेताओं की पत्नियों या बेटियों को ही दी जाती हैं यानी महिलाओं के नाम पर प्रॉक्सी विधायक होते हैं, जैसा कि पंचायतों में ‘प्रधान पति’ होते हैं।
बिहार के मौजूदा विधानसभा चुनाव में मुख्य राजनीतिक दलों ने भले ही गिनती की महिलाओं को ही अपना प्रत्याशी बनाया हो, लेकिन वह सभी महिला मतदाताओं के लिए ही महाभारत कर रही हैं। उन्होंने जो बिहार के लिए कल्याण मॉडल पेश किया है, वह महिलाओं के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है, विशेषकर मांओं व कामकाजी महिलाओं के। महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा, मतप्रयोग प्रभाव और जमीनी प्रशासन ही उनके मॉडल के केंद्र में है। बहरहाल, कड़वा सच यह है कि महिलाओं को जब तक राजनीतिक सत्ता में उनकी संख्या के अनुपात में हिस्सेदारी नहीं मिलेगी, तब तक किसी मॉडल से उनका भला नहीं होगा और राजनीतिक हिस्सेदारी भी कोई पार्टी उनको देना नहीं चाहती, जैसा कि टिकट वितरण से स्पष्ट है।

 

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