-हर ३ मिनट में बच्चों के साथ होता है अपराध
-राज्य बना गुमशुदगी और अपहरण का बड़ा अड्डा
जेदवी / मुंबई
महाराष्ट्र में बेटियों की सुरक्षा को लेकर किए जा रहे सरकारी दावों के बीच एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (सीआरवाई) की ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य में लड़कों की तुलना में ज्यादा लड़कियां लापता हो रही हैं। वर्ष २०२४ में लापता हुए बच्चों में ५७.१ प्रतिशत बच्चियां थीं। यानी महाराष्ट्र में बेटियां सबसे ज्यादा खतरे में हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष २०२४ में राज्य से कुल ३,४९५ बच्चे लापता हुए, जिनमें २,०५७ लड़कियां और १,४३८ लड़के शामिल हैं। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं, बल्कि उस भयावह सच्चाई का संकेत है, जहां परिवारों को यह भरोसा तक नहीं रह गया कि उनकी बेटियां सुरक्षित घर लौटेंगी। सोमवार को सीआरवाई के पश्चिम विभाग की निदेशक करिएन राबादी ने कहा कि केवल नारों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि वर्ष २०२४ में ३,७३७ बच्चों को खोज निकाला गया, जिनमें २,१२३ लड़कियां, १,६११ लड़के और ३ ट्रांसजेंडर बच्चे शामिल हैं। हालांकि, बच्चों को खोजने की दर २०२३ के ६४.८ प्रतिशत से बढ़कर २०२४ में ६७.१ प्रतिशत हुई है, लेकिन इसके बावजूद १,८०३ बच्चे अब भी लापता हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष २०२४ में महाराष्ट्र में बच्चों से जुड़े २४,१७१ अपराध दर्ज किए गए। इनमें १२,९९४ मामले बाल अपहरण और गुमशुदगी से संबंधित थे, जो देश में सबसे अधिक हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, देश में हर तीन मिनट में बच्चों के खिलाफ एक अपराध दर्ज हो रहा है।
हर दिन बढ़ रहा बच्चों पर अपराध का खतरा
महाराष्ट्र में वर्ष २०२४ के दौरान २४,१७१ बाल अपराध दर्ज किए गए, जिनमें १२,९९४ मामले अपहरण और गुमशुदगी से जुड़े थे। राज्य में अब भी १,८०३ बच्चे लापता हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हालात और भयावह हैं। एनसीआरबी के अनुसार देश में हर दिन ५१४ से ज्यादा बच्चे अपराध का शिकार हो रहे हैं। यानी औसतन हर तीन मिनट में बच्चों के खिलाफ एक अपराध दर्ज किया जा रहा है, जिससे अभिभावकों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
