भोर उठी नभ पर जो आई,
सूरज की किरणें मुस्काई।
फूल फूले उपवन मुसकाए,
मधुरम पवन संदेश सुनाए॥
सूरज निकला धीरे-धीरे,
बूंदें झिलमिल शिखर समीरे।
कोयल गा रही मीठे राग,
भोर का है अनुराग सुजाग॥
कृषक चले फिर हल को लेकर,
भोर चली नव आशा लेकर।
दीप जले फिर कर्मस्थली में,
जीवन जागा मधुर कली में॥
भोर समय संतों की बेला,
हरि-स्मरण से मिटे झमेला।
मन शुद्धि का समय ये प्यारा,
अमृत-जैसा प्रभात हमारा ll
-डॉ. कनक लता तिवारी
