मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : ‘मैं जिंदा हूं, फिर वोटर लिस्ट में मृत क्यों?’

दिल्ली लाइव : ‘मैं जिंदा हूं, फिर वोटर लिस्ट में मृत क्यों?’

-अरुण कुमार गुप्ता
लोकतंत्र में नागरिक अपनी सरकार चुनने के लिए वोट देता है, लेकिन जब उसी नागरिक को मतदाता सूची में मृत दर्ज कर दिया जाए, तो सवाल सिर्फ एक नाम कटने का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है। दिल्ली के ५३ वर्षीय दर्जी कामता प्रसाद की कहानी इसी गंभीर सवाल को सामने लाती है। जिस इंसान के सामने पूरा परिवार खड़ा है, उसे अपनी जिंदगी का प्रमाण सरकारी दफ्तरों में क्यों देना पड़ रहा है? रिपोर्ट के मुताबिक, कामता प्रसाद विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों में शामिल हैं। रिपोर्ट बताती है कि उन्हें अपना नाम दोबारा दर्ज कराने की कोशिश में अलग-अलग सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। रोजाना करीब २५० रुपये की दिहाड़ी पर परिवार चलाने वाले कामता प्रसाद के लिए यह प्रक्रिया समय और कमाई, दोनों पर भारी पड़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से लगभग ४२ लाख नाम हटाए गए। देशभर में यह संख्या करीब १३ करोड़ बताई गई है। नाम हटाने के पीछे मृत्यु, स्थान परिवर्तन, अनुपलब्धता और रिकॉर्ड में विसंगतियों जैसे कारण बताए गए हैं, लेकिन असली सवाल उन मामलों का है, जिनमें जीवित नागरिकों को मृत या स्थायी रूप से स्थानांतरित दर्ज किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यदि रिकॉर्ड में गलती हुई है, तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या नागरिक को ही हर कार्यालय में जाकर अपनी पहचान और पात्रता दोबारा साबित करनी होगी? और जिन लोगों की रोजी-रोटी दिहाड़ी पर निर्भर है, उनके समय और खर्च की भरपाई कौन करेगा?
‘वोट चोरी’ की आग में घिरे चुनाव आयुक्त!
चुनाव लोकतंत्र की ताकत है, मतदाता उसका आधार और चुनाव आयोग उस पूरी प्रक्रिया का संवैधानिक प्रहरी। लेकिन जब इसी प्रहरी की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें तो विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। वह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे से जुड़ जाता है। दिल्ली में भारतीय युवा कांग्रेस के ताजा प्रदर्शन ने इसी बहस को फिर सुर्खियों में ला दिया है। १९ अक्टूबर को नई दिल्ली के रायसीना रोड स्थित युवा कांग्रेस कार्यालय में कार्यकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के चेहरे वाला रावण का पुतला जलाया। प्रदर्शन के दौरान ‘वोट चोरी की रासलीला’ नाम से नुक्कड़ प्रस्तुति भी की गई। युवा कांग्रेस ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। विवाद की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का मामला है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब ४२ लाख नाम हटाए गए। देशभर में यह संख्या लगभग १३ करोड़ बताई गई है। हटाए गए नामों में मृत, स्थानांतरित और अनुपलब्ध मतदाताओं के रिकॉर्ड शामिल बताए गए हैं। युवा कांग्रेस का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल हैं। संगठन की मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त इन सवालों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ें। यह संगठन का राजनीतिक रुख है; आरोपों की पुष्टि और किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए स्वतंत्र जांच तथा संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण जरूरी है। दिल्ली में रावण के पुतले का दहन प्रतीकात्मक राजनीतिक विरोध था। लेकिन इस प्रदर्शन से उठे सवाल प्रतीक से आगे जाते हैं।

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