मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनामत पूछा करो हाल हमारा…

मत पूछा करो हाल हमारा…

मत पूछा करो हाल हमारा,
जब हर बिगड़ी हुई सांस में
हाथ तुम्हारा ही शामिल है।
कैसी यह झूठी हमदर्दी,
जब हर जख्म की तह में
नाम तुम्हारा भी शामिल है।

क्यों ओढ़े हो अपनेपन का
यह रेशमी-सा आवरण,
जब हर मुस्कान की तह में
छिपा है तुम्हारे स्वार्थ का कारण।

थक गए हैं अपनों के मेले में
गैरों के चेहरे की शिनाख्त में।
उम्मीद के दीप जलाए बहुत,
मगर अंधेरे से नाता जुड़ता रहा।

नजरें आज भी झुक जाती हैं,
इल्जाम तुम पर धरते नहीं;
जिसे राहों का रहबर समझा,
उससे शिकवा भी करते नहीं।

अब रहने भी दो यह दिखावा,
यह अपनापन खंजर-सा चुभता है;
दूर से जितना उजला दिखे,
पास आकर उतना ही जलता है।

हमने दर्द से दोस्ती कर ली है,
तन्हाई से रिश्ता जोड़ लिया है;
अब तुम्हारी हमदर्दी नहीं,
अपने जख्मों से दोस्ती कर ली है।

न पूछो अब हाल हमारा,
हम खामोशी में भी मुस्कुरा लेंगे;
तुम साथ न भी चलो तो क्या,
हम टूटकर भी सफर निभा लेंगे।

मुनीष भाटिया
मोहाली

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