-समधिस्थ संत दिगंबर जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज के 59वें अवतरण दिवस पर फिर उनकी अभिव्यक्ति याद आ रही है। सच्चाई का कच्चा चिट्ठा है उनकी कविता।
फिर घमंड कैसा
घी का एक लोटा,
लकड़ियों का ढेर,
कुछ मिनटों में राख…
बस इतनी-सी है
आदमी की औकात!!!!
एक बूढ़ा बाप शाम को मर गया,
अपनी सारी जिंदगी
परिवार के नाम कर गया।
कहीं रोने की सुगबुगाहट,
तो कहीं ये फुसफुसाहट…
अरे, जल्दी ले चलो,
कौन रखेगा सारी रात…
बस इतनी-सी है
आदमी की औकात!!!!
मरने के बाद नीचे देखा तो
नजारे नजर आ रहे थे।
मेरी मौत पर…
कुछ लोग जबरदस्त,
तो कुछ जबरदस्ती
रोए जा रहे थे।
नहीं रहा… चला गया…
दो-चार दिन करेंगे बात…
बस इतनी-सी है
आदमी की औकात!!!!
बेटा अच्छी-सी तस्वीर बनवाएगा,
उसके सामने अगरबत्ती जलाएगा।
खुशबूदार फूलों की माला होगी…
अखबार में अश्रुपूरित श्रद्धांजलि होगी…
बाद में शायद कोई उस तस्वीर के
जाले भी नहीं करेगा साफ…
बस इतनी-सी है
आदमी की औकात!!!!
जिंदगी भर,
मेरा-मेरा किया…
अपने लिए कम,
अपनों के लिए ज्यादा जिया…
फिर भी कोई न देगा साथ…
जाना है खाली हाथ…
क्या तिनका ले जाने के लायक भी
होंगे हमारे हाथ???
बस
ये है हमारी औकात….!!!!
जाने कौन-सी शोहरत पर,
आदमी को नाज है!
जो आखिरी सफर के लिए भी,
औरों का मोहताज है!!!!
फिर घमंड कैसा?
बस इतनी-सी है
हमारी औकात…
