पिछले दस-बारह सालों में हमारा समाज नामर्द हो चुका है। समाज को नपुंसक, गूंगा और बहरा बनाने का काम आज के हुक्मरानों ने किया है। मुंबई में दौड़ती लोकल ट्रेन में २२ साल के नौजवान मयंक लोहार की हत्या कर दी गई। यह हत्या किसी चोरी या डवैâती के इरादे से नहीं हुई थी। बारिश का पानी डिब्बे के अंदर न आए, इसलिए दरवाजा बंद करने को लेकर एक मामूली सा विवाद हुआ और इसी बात पर एक सिरफिरे युवक ने मयंक पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। भला यह भी कोई हत्या की वजह हुई? यह समाज ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाता है। भाजपा के कहने पर ‘हिंदुत्व खतरे में है’ की बयानबाजी करता है, लेकिन धर्म का मुख्य सार जो ‘संयम और चिंतन’ है, उसे पूरी तरह भूल चुका है और इंसान ही इंसान का खून बहा रहा है। पुणे में एक युवती ने अपने होनेवाले पति की हत्या कर दी। उससे पहले पुणे में ही एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी जान ले ली गई। खुद को ‘सुसंस्कृत’ कहनेवाले महाराष्ट्र में आज बेगुनाहों के खून की नदियां बह रही हैं और समाज ठंडे दिमाग से इसे तमाशे की तरह देख रहा है। मुंबई के मयंक हत्याकांड में भी यही हुआ। जब एक सनकी हत्यारा मयंक पर सरेआम चाकू से वार कर रहा था, तब खचाखच भरे उस डिब्बे में मौजूद जनता मुर्दों की तरह खड़ी होकर इस कत्लेआम का वीडियो बना रही थी या फिर ठंडे मन से इस खूनी खेल को देख रही थी। मयंक चीख रहा था, चिल्ला रहा था, तड़प रहा था और कातिल शराब के नशे में धुत वहीं अकड़कर खड़ा था। मयंक पर जब पहला वार हुआ था, तभी अगर किसी एक सहयात्री ने थोड़ी सी मर्दानगी और हिम्मत दिखाकर उसे रोका होता, तो उस २२ साल के नौजवान की जान बच जाती। उस डिब्बे में भारी भीड़ थी और सारे के सारे पुरुष ही थे। लेकिन उनका बर्ताव मर्दों जैसा कतई नहीं था। अगर पांच-दस लोग भी मिलकर उस
हमलावर को दबोच लेते
तो वह नीचे गिर पड़ता, लेकिन सैकड़ों आंखों के सामने एक कत्ल हो गया। कातिल आराम से ट्रेन से उतरकर चला गया और मुसाफिर सिर्फ ठंडी आहें भरते रह गए। कातिल का गला पकड़ने की मर्दानगी किसी एक ने भी नहीं दिखाई। यह नामर्दी की पराकाष्ठा है! समाज में यह नपुंसकता पिछले दस सालों में लगातार बढ़ी है। ‘आस-पास होनेवाली ऐसी घटनाओं का विरोध मत करो, अपनी आवाज मत उठाओ’, यही सीख आज के समाज को घुट्टी में पिलाई गई है। ‘धर्मांतरण’, ‘कॉर्पोरेट जिहाद’, ‘मंदिर-मस्जिद’ और ‘हिंदू-मुसलमान’ जैसे मुद्दों पर यह समाज उबल पड़ता है, लेकिन जब मयंक लोहार पर सरेआम छुरी चल रही थी, तब यही समाज हिजड़ों की तरह खामोश बैठा रहा। फडणवीस-शिंदे के राज में आम जनता पूरी तरह असुरक्षित है। यह सरकार अब आम जनता की रही ही नहीं। राजनीति के गद्दारों को भारी पुलिस सुरक्षा मिली हुई है, जबकि सरकार के खिलाफ बोलनेवालों पर राज्य का गृह मंत्रालय फौरन कार्रवाई करता है। एक सांसद सरेआम मीडिया के सामने कबूल करता है, ‘मैंने पांच कत्ल किए हैं और मेरे पास बम हैं।’ महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में महाराष्ट्र आज दूसरे नंबर पर पहुंच चुका है। सुबह उठकर जब लोग अखबार पढ़ते हैं, तो आम इंसान को यह समझ नहीं आता कि हम महाराष्ट्र में रह रहे हैं या बिहार में? हमारे आस-पास जब आतंकवादियों और गुंडों के गिरोह घूम रहे हों, तो कोई जिए तो वैâसे जिए? इनमें से ज्यादातर माफिया आज सत्ताधारी पार्टियों के विधायक, सांसद और पदाधिकारी बन बैठे हैं। इसी का नतीजा है कि ‘कानून’ अब कानून का नहीं, बल्कि गुंडों का रखवाला बन गया है। महाराष्ट्र को आज एक
पूर्णकालिक गृहमंत्री की जरूरत
है। देवेंद्र फडणवीस आज गृहमंत्री के रूप में विपक्ष की पार्टियों को तोड़ने में इतने मशगूल हैं कि वे यह भूल ही गए हैं कि आम जनता की सुरक्षा करना उनकी मुख्य जिम्मेदारी थी। महाराष्ट्र में कानून और व्यवस्था अधर में लटकी हुई है। लोकल ट्रेनों में हत्याएं हो रही हैं, बलात्कार हो रहे हैं और गृहमंत्री दूसरों की पार्टियों की हत्या करने का खेल खेलने में व्यस्त हैं। पिछले पांच महीनों में दौड़ती लोकल ट्रेन में किसी यात्री की हत्या की यह दूसरी घटना है। जनवरी में चर्चगेट-बोरीवली लोकल से उतरते समय प्रोफेसर आलोक सिंह की हत्या कर दी गई थी। अब मयंक लोहार को मार दिया गया।
ऐसी खूनी वारदातें बेहद मामूली विवादों की वजह से हो रही हैं। लोगों का संयम अब खत्म हो चुका है। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े बढ़ रहे हैं और एक-दूसरे का खून बहाया जा रहा है। भारत के हुक्मरानों ने संयम और सहनशीलता का रास्ता छोड़ दिया है। रोज सुबह उठकर लोगों का दिमाग भड़काना और उन्हें धर्म के नाम पर हिंसा के लिए उकसाना, यही धंधा आजकल जोर-शोर से चल रहा है। मयंक लोहार भी हिंदू था और उसे मारने वाला रोशन सुवर्णा भी हिंदू ही है। अगर रोशन की जगह कोई रफीक, रईस या अब्दुल होता तो भाजपा और शिंदे गुट के लोग इसे ‘लोकल ट्रेन जिहाद’ का नाम दे देते। वे मुंबई में ‘हिंदू खतरे में है’ का ढोल पीटते हुए सड़कों पर नंगा नाच शुरू कर देते। समाज के संयम, सहिष्णुता और शांति को खत्म करके अराजकता की चिंगारी सुलगाने वालों ने ही इस ‘नामर्द भीड़’ को पैदा किया है। जब देश पर मुसीबत आती थी, तब जो समाज बहादुरी दिखाता था और लड़ता था, वह समाज पिछले बारह सालों में पूरी तरह नष्ट हो चुका है। देश में आज सिर्फ नामर्दों की भीड़ बची है, और यह नपुंसक भीड़ सिर्फ बेगुनाहों के खून की नदियां बहते हुए मूकदर्शक बनकर देख रही है!
