मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात: पहचान की सियासत और जमीनी हकीकत

इस्लाम की बात: पहचान की सियासत और जमीनी हकीकत

सैयद सलमान / मुंबई

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से संख्याबल, सामाजिक समीकरणों और प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। हाल ही में ऑल इंडिया मुस्लिम जमात द्वारा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को लिखी गई एक चिट्ठी ने राज्य के सियासी गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जमात चाहती है कि अखिलेश यादव किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने का एलान करें। २०११ में हुई जनगणना में १९.३ प्रतिशत के आंकड़ों से आगे बढ़कर आज लगभग २० प्रतिशत के अनुमानित दायरे में खड़ी मुस्लिम आबादी, सूबे की करीब १२० से १४० विधानसभा सीटों पर हार-जीत तय करने की कूवत रखती है। पहली नजर में यह मांग लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का स्वाभाविक हिस्सा लग सकती है, लेकिन भारतीय राजनीति के जमीनी मिजाज और उत्तर प्रदेश के मौजूदा सियासी गणित के चश्मे से देखने पर यह पूरी तरह से अपरिपक्व, अव्यावहारिक और विशुद्ध रूप से ध्रुवीकरण को बढ़ावा देनेवाली एक सियासी चाल नजर आती है।
लोकतंत्र में किसी भी वर्ग को शीर्ष पद की आकांक्षा रखने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन तथ्य यह भी है कि भारतीय राजनीति का व्यावहारिक गणित सिर्फ आबादी के आंकड़ों के बजाय, सामाजिक स्वीकार्यता और व्यापक गठजोड़ से संचालित होता है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और बहु-सांस्कृतिक राज्य में वर्तमान सियासी परिदृश्य को देखते हुए, मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग करना न सिर्फ बेजा है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अपरिपक्व नजर आती है। इतिहास गवाह है कि सूबे की राजनीति में किसी एक जाति या समुदाय के बूते सत्ता के शिखर तक पहुंचना नामुमकिन रहा है। चाहे वह दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग का दौर रहा हो या फिर गैर-यादव पिछड़ा वर्ग और अगड़ी जातियों का समीकरण, सत्ता हमेशा व्यापक सामाजिक समावेश से ही हासिल हुई है।
इस संदर्भ में, मुस्लिम समुदाय की तुलना यादव या अन्य प्रभावी जातियों से करना तार्किक रूप से कमजोर तर्क है। ७ प्रतिशत आबादी वाले यादव समाज या किसी अन्य वर्ग का नेतृत्व जब सत्ता तक पहुंचता है, तो उसके पीछे एक व्यापक बहुसंख्यक सामाजिक आधार का समर्थन और गठबंधन होता है। इसके उलट, आज के ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल में यदि कोई दल किसी मुस्लिम चेहरे को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करता है तो वह अनजाने में ही सही, ‘प्रति-ध्रुवीकरण’ अर्थात काउंटर-पोलराइजेशन की जमीन तैयार कर देता है। यह स्थिति अंतत: उसी वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान पहुंचाती है, जिसके फायदे के लिए यह मांग उठाई जा रही है। ऐसी घोषणा बहुसंख्यक समाज के बड़े हिस्से को एकमुश्त गोलबंद होने का सीधा अवसर दे देती है, जिससे चुनाव का पूरा एजेंडा विकास और जनकल्याण से भटककर धार्मिक पहचान पर केंद्रित हो जाता है।
उत्तर प्रदेश में पश्चिम उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक के राजनीतिक भूगोल में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम, पीस पार्टी, ओलमा काउंसिल जैसी ताकतों की मौजूदगी ने पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिशें अभी से तेज कर दी हैं। मुरादाबाद, बिजनौर, आजमगढ़ और मऊ जैसे क्षेत्रों में त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले की स्थिति पैदा कर चुनावी गणित को उलझाने का प्रयास लगातार होता रहा है। ऐसे माहौल में ऑल इंडिया मुस्लिम जमात की यह चिट्ठी कहीं न कहीं मुख्यधारा के विपक्षी दलों पर एकतरफा दबाव बनाने और खुद को मुस्लिम समाज का मसीहा के रूप में स्थापित करने की होड़ का हिस्सा प्रतीत होती है। यह रणनीति विपक्ष के समूचे धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को कमजोर कर सकती है।
व्यावहारिक राजनीति का एक सच यह भी है कि उत्तर प्रदेश की ४०३ विधानसभा सीटों में से अधिकांश पर चुनाव जीतने के लिए सर्वसमावेशी छवि का होना अनिवार्य है। आज के दौर में जब राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक अस्मिता और बहुसंख्यक चेतना जैसे मुद्दे चुनावी नैरेटिव को तय कर रहे हैं, तब इस प्रकार की मांगें सिर्फ सत्ताधारी दल के लिए ‘तुष्टिकरण’ के पुराने आरोपों को दोबारा जिंदा करने का हथियार साबित होती हैं। यह मांग इस बुनियादी सच की अनदेखी करती है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है और वर्तमान में ऐसी कोई संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती जो इस मांग को हकीकत में बदल सके।
लिहाजा, इस तरह के कदम को अदूरदर्शी सियासी कदम ही कहा जाएगा, जो जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटी हुई है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रतीकों की राजनीति का महत्व जरूर है, लेकिन जब प्रतीक व्यावहारिक धरातल से टकराते हैं, तो वे महज विभाजनकारी तत्वों को ऊर्जा देने का काम करते हैं। उत्तर प्रदेश को आज पहचान की इस नई खींचतान के बजाय एक ऐसे माहौल की जरूरत है जो आर्थिक प्रगति, रोजगार और सामाजिक समरसता को केंद्र में रखे। किसी वर्ग विशेष के तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए उठाई गई ऐसी बेतुकी मांग अंतत: सूबे की राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक शुचिता को ही आहत करेगी।
(लेखक मुंबई विश्वविद्याल्य, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

अन्य समाचार