मुख्यपृष्ठसमाचारऑपरेशन सिंदूर में शहीद हुए सुरेंद्र कुमार को मिला सम्मान

ऑपरेशन सिंदूर में शहीद हुए सुरेंद्र कुमार को मिला सम्मान

नेशनल वॉर मेमोरियल की वेबसाइट के रोल ऑफ ऑनर में शामिल

रमेश सर्राफ धमोरा / झुंझुनू

राजस्थान के झुंझुनू जिले के मेहरादासी गांव के वीर सपूत एवं भारतीय वायु सेना के सार्जेंट सुरेंद्र मोगा की शहादत को आखिरकार आधिकारिक राष्ट्रीय सम्मान मिल गया है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सर्वोच्च बलिदान देने वाले छह जवानों के नाम पहली बार आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक किए गए हैं। इनमें मेहरादासी निवासी सार्जेंट सुरेंद्र मोगा का नाम भी शामिल है। उनके नाम को नई दिल्ली स्थित नेशनल वॉर मेमोरियल की वेबसाइट के रोल ऑफ ऑनर में शामिल किया गया है। साथ ही राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की 3डी वॉल पर वर्ष 2025 के खंड में भी उनका नाम अंकित कर दिया गया है।
नेशनल वॉर मेमोरियल के त्याग चक्र में बनी 16 गोलाकार ग्रेनाइट दीवारों पर आजादी के बाद देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सभी सैनिकों के नाम, रैंक और यूनिट अंकित हैं। अब इस गौरवशाली सूची में सार्जेंट सुरेंद्र मोगा का नाम भी हमेशा के लिए दर्ज हो गया है।
भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमरप्रीत सिंह स्वयं मेहरादासी गांव पहुंचे थे। उन्होंने शहीद की वीरांगना सीमा देवी, माता नानू देवी तथा अन्य परिजनों से मुलाकात कर उन्हें ढांढस बंधाया और भरोसा दिलाया कि भारतीय वायु सेना अपने जांबाज के बलिदान को कभी भुलाएगी नहीं। बाद में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सार्जेंट सुरेंद्र मोगा को मरणोपरांत वायु सेना मेडल (गैलंट्री) से सम्मानित किया। वहीं, भारतीय वायु सेना ने नई दिल्ली स्थित अपनी एक आधिकारिक विंग का नाम सुरेंद्र हॉल रखकर भी उन्हें श्रद्धांजलि दी।
नेशनल वॉर मेमोरियल के रोल ऑफ ऑनर में नाम शामिल होने के बाद शहीद के परिवार ने संतोष व्यक्त किया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हुए छह जवानों में सार्जेंट सुरेंद्र मोगा भारतीय वायु सेना के एकमात्र शहीद थे, जबकि बाकी पांच जवान भारतीय थल सेना से थे। इसके साथ ही पूरे ऑपरेशन में राजस्थान से शहीद होने वाले भी वे एकमात्र सैनिक रहे।
झुंझुनू जिले के मेहरादासी गांव से निकलकर देश की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने वाले सार्जेंट सुरेंद्र मोगा का नाम अब हमेशा के लिए देश के वीर शहीदों की सूची में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। लंबे इंतजार के बाद मिले इस आधिकारिक सम्मान ने न केवल परिवार, बल्कि पूरे झुंझुनू और राजस्थान को गर्व से भर दिया है।

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