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बिश्नोई गैंग का फॉर्मूला अपना रहे हैं ड्रग्स स्मगलर! …‘फोटो कोड’ बना तस्करी कोड

 -साकीनाका पुलिस ने किया पर्दाफाश
फिरोज खान / मुंबई
पुलिस को चकमा देने के लिए लॉरेंस बिश्नोई गैंग फोटो कोड का इस्तेमाल करता था। अब यही फॉर्मूला ड्रग्स तस्करों ने अपना लिया है। इस बात का खुलासा तब हुआ, जब साकीनाका पुलिस ने एक बड़े ड्रग्स स्मगलर को गिरफ्तार किया।
उल्लेखनीय है कि हथियार लानेवाला और लेनेवाला एक-दूसरे को जानते नहीं थे, सिर्फ फोटो कोड के जरिए वे एक-दूसरे को पहचान लेते और हथियारों को डिलिवर कर देते थे। फोटो कोड का मकसद यह होता कि अगर दोनों में से कोई एक व्यक्ति गिरफ्तार हो भी जाए तो वह दूसरे व्यक्ति के बारे में पुलिस को कुछ बता न पाए। फोटो कोड का मतलब यह है कि ड्रग्स लानेवाला और डिलिवरी लेनेवाले को एक-दूसरे के टीशर्ट की फोटो भेजी जाती है। उसी आधार पर दोनों एक-दूसरे को पहचान लेते हैं और ड्रग्स की डिलिवरी कर देते हैं।
ड्रग्स फैक्ट्री का भंडाफोड़
कर्नाटक के मैसूर में ४३४ करोड़ रुपए की ड्रग्स पैâक्ट्री का भंडाफोड़ हुआ था। केस की जांच शुरू हुई तो कई चौंकानेवाले खुलासे हुए। मुंबई की साकीनाका पुलिस ने जांच के दौरान खुलासा किया कि किस तरह ड्रग्स की तस्करी का रैकेट काम करता था। कर्नाटक से महाराष्ट्र तक ड्रग्स की तस्करी और इंटरनेशनल स्तर तक इसकी सप्लाई होती थी। ड्रग्स सप्लायर इसके लिए अनोखा और बेहद गुप्त तरीका अपनाते थे।
शर्ट की फोटो कोडवर्ड
मुंबई पुलिस के मुताबिक, इस नेटवर्क में टीशर्ट की फोटो को कोडवर्ड के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। जांच में सामने आया कि ड्रग्स की सप्लाई और प्रोडक्शन की प्रक्रिया दो अलग-अलग गिरोह करते थे। सबसे हैरान करनेवाली बात यह है कि इन दोनों ही गैंग के सदस्यों को एक-दूसरे के बारे में कुछ पता नहीं होता था। यह ड्रग्स बनाने की पैâक्ट्री और इसके सप्लाई की चेन पूरे ऑपरेशन की सबसे खतरनाक और शातिर मॉडस ओपरेंडी अपनाती थी।
पर्दाफाश करने में कामयाबी
पुलिस ने बताया कि इस तरह की व्यवस्था से नेटवर्क की परतें खोलना बेहद मुश्किल हो जाता है। हालांकि, पुलिस बड़ी मुश्किल से इसका पर्दाफाश करने में कामयाब हुई है। साकीनाका पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी के मुताबिक, मैसूर की पैâक्ट्री में एमडी ड्रग्स तैयार होती थी। यहां काम करनेवालों को नहीं पता होता था कि यह कहां जाएगी। खेप को एक-दूसरे गैंग के जरिए सबसे पहले कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु पहुंचाया जाता था। बंगलुरु में मुंबई गैंग का एक मेंबर पहले से ही मौजूद होता था। ड्रग्स सप्लाई करने और उसे लेने आनेवालों को एक-दूसरे को एक कोड दिखाना होता था।

व्हॉट्सऐप पर भेजते थे टीशर्ट की फोटो
पुलिस ने बताया यह कोड एक टीशर्ट होती थी। जो हर बार सप्लाई के लिए अलग-अलग यूज की जाती थी। दोनों के पास सेम टीशर्ट की फोटो व्हॉट्सऐप किया जाता था। फिर वे एक-दूसरे को वह दिखाकर खेप की सप्लाई करते थे। इस तरह खेप को बंगलुरु से मुंबई तक लाया जाता था। यहां इसे मुंबई के अलग-अलग इलाकों में स्थानीय सप्लायर्स के जरिए सप्लाई होता था। जांच में यह भी पता चला है कि ड्रग्स स्मगलिंग का पूरा कारोबार सड़क के रास्ते से होता था। प्राइवेट बसें और निजी वाहनों का उपयोग कर पुलिस को चकमा दिया जाता था।

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