सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ के विजयादशमी सम्मेलन में हमेशा की तरफ अपना भाषण दिया। उसमें कोई मार्गदर्शन, दिशा-निर्देश आदि नहीं था। संघ की स्थापना को सौ वर्ष हो चुके हैं इसलिए यह माना जा रहा था कि विजयादशमी सम्मेलन में कुछ अलग संदेश दिया जाएगा। सरसंघचालक ने भाजपा के ही सुर में सुर मिलाया। भागवत ने अपने भाषण में पड़ोसी देशों में जन आंदोलनों का उल्लेख किया। पड़ोसी देश श्रीलंका, बांग्लादेश और हाल ही में नेपाल में जनाक्रोश के हिंसक आंदोलन के चलते सत्ता परिवर्तन हुआ। ऐसी गड़बड़ियों को बढ़ावा देनेवाली ताकतें हमारे देश के साथ-साथ दुनियाभर में सक्रिय हैं। सरसंघचालक ने टिप्पणी की कि सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त करने के लिए सड़कों पर उतरना और हिंसा का सहारा लेना सही नहीं है। क्या भागवत द्वारा दिया गया मार्गदर्शन सही है या फिर लगातार हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा भड़काकर नफरत को बढ़ावा देनेवाली भाजपा की राजनीति? मोदी-शाह का शासन संघ के सपने को साकार करना है। संघ की धारणा देश की एकता को समाप्त कर यहां सहिष्णु हिंदुओं का नहीं बल्कि कट्टर, सड़ी हुई मानसिकता वाले हिंदुओं का शासन स्थापित कर उस राज को ‘हिंदू राष्ट्र’ के रूप में मान्यता दिए जाने की है। संक्षेप में, संघ यहां हिंदू मोहम्मद अली जिन्ना का शासन चाहता है। उनका लक्ष्य भारत को ‘हिंदू पाकिस्तान’ बनाना है और इसके लिए चाहे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लोकतंत्र और देश की संसद की बलि ही क्यों न देनी पड़े। संघ के बौद्धिक विभाग को श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश में भड़के जन-आंदोलन पर चिंतन करना चाहिए। वहां के शासकों ने पहले लोगों को कट्टरता और उग्र राष्ट्रवाद का ‘डोज’ देकर मदहोश किया, बाद में उस नशे की मात्रा बढ़ाकर लोगों को अंधभक्त बना दिया। जब लोग समाधि की उस अवस्था में पहुंच गए
तो देश को लूट कर
मित्रों, उद्योगपतियों, रिश्तेदारों की संपत्ति बढ़ाई गई। जब जनता का नशा उतरा तो वह अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आई। उन्होंने सड़कों पर सरकार से संघर्ष किया, जिसे दबाने के लिए सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलार्इं। लोगों ने बंदूकों की परवाह किए बिना मंत्रियों के घरों में घुसकर उन्हें नष्ट कर दिया। उन्होंने भ्रष्टाचारियों को सड़कों पर लाकर मार डाला। यह हिंसा जरूर हुई, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि यह शासकों के विरुद्ध जनाक्रोश के कारण थी। बांग्लादेश और नेपाल में यही हुआ। जब लोकतंत्र का गला घोंटा जाता है और लोकतांत्रिक तरीकों से बदलाव लाने के रास्ते बंद कर दिए जाते हैं, तभी ऐसे जनाक्रोश से क्रांति होती है। सरसंघचालक को डर है कि ऐसा जनाक्रोश भारत में भी होगा, क्योंकि पिछले दस सालों में मोदी-शाह ने जनता से झूठे वादे किए। धार्मिक दंगे करवाए। उन्होंने पूरे देश को अडानी जैसे लाडले उद्योगपतियों की जेब में डाल दिया। सरसंघचालक को इस लूट पर कड़ा बयान देने की जरूरत थी। ब्रिटिश काल में जब राष्ट्रीय संपत्ति की इस तरह की लूट बढ़ी तब स्वराज्य के लिए आंदोलन शुरू हुआ। लोग देशभक्ति में रंग कर सड़कों पर उतर आए। गांधीजी के नेतृत्व में संघर्ष हुआ और अंग्रेजों को इस देश से खदेड़ दिया गया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश के बाद भारत में जनता का राज आया। बेशक, देश के स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद के राष्ट्र निर्माण कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहीं नहीं था। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की जरा-सी भी खरोंच संघ की प्रगति पर नहीं पड़ी। आश्चर्य की बात है कि ये लोग फिर भी आजादी, राष्ट्रवाद आदि पर भाषण झाड़ते हैं। संघ के १०० साल पूरे होने पर केंद्र सरकार ने उसके नाम पर डाक टिकट और विशेष सिक्के जारी किए हैं, लेकिन संघ द्वारा बनाया गया भाजपा का सिक्का नकली और भ्रष्ट है। संघ ने मोदी-शाह जैसे तानाशाह पैदा किए हैं और उनकी तानाशाही को मजबूत किया है, अब संघ के ये पाप आज
देश की गर्दन
पर सवार हैं। इन मंडलियों के राष्ट्रवाद का रोज पर्दाफाश हो रहा है। जय शाह भारतीय टीम को पहलगाम में २६ महिलाओं के सिंदूर उजाड़ने वाले पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने के लिए मजबूर करता है और जय शाह के पिता, गृह मंत्री अमित शाह, देशवासियों को राष्ट्रवाद पर व्याख्यान देते हैं। और ये सभी लोग संघ के स्वयंसेवक हैं। सोनम वांगचुक ने भारत माता के लिए कड़ी मेहनत की। उन्होंने भारतीय सैनिकों के लिए शोध किया। लेकिन जैसे ही वांगचुक ने कहा कि चीन लद्दाख में घुस रहा है और भारतीय भूमि पर कब्जा कर रहा है, उन्हें देशद्रोही करार देकर गिरफ्तार कर लिया गया। लद्दाख में जनता ने आंदोलन किया। वह आंदोलन भाजपा की धोखेबाजी के खिलाफ था। प्रदर्शनकारियों ने लद्दाख में भाजपा कार्यालय को जला दिया। उन्होंने भाजपा का झंडा जला दिया, लेकिन कार्यालय पर लगे भारतीय तिरंगे की रक्षा की। ऐसी घटनाएं सरसंघचालक को रोमांचित नहीं करती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के डीएनए में किस तरह का राष्ट्रवाद और हिंदुत्व है, इस पर शोध करने की आवश्यकता है। जिन मोदी-शाह की राजनीति के कारण देश की संस्कृति और एकता खतरे में है, जिनके प्रशासन ने देश के संविधान, संसद और न्यायपालिका को बर्बाद कर दिया है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन लोगों के साथ खड़ा है। जन क्षोभ और जनांदोलन स्वतंत्रता और लोकतंत्र द्वारा जनता को दिए गए अधिकार हैं। हुक्मरान उन्हें दबा नहीं सकते। परिवर्तन लोकतांत्रिक तरीकों से ही संभव है, लेकिन जब लोकतंत्र, चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय तानाशाह के महलों में सिर नवाने लगें तब क्या किया जाना चाहिए? सरसंघचालक को इस पर देश का मार्गदर्शन करने की आवश्यकता थी। मोदी-शाह के राजकाज की जय-जयकार करने के लिए कायरों और भाड़े के लोगों की एक बड़ी फौज है। भागवत भी इसमें शामिल हो गए हैं। राष्ट्रभक्त जनता अचंभित है, सवाल पूछ रही है, ‘भागवत, आप भी ?
