संविधान और लोकतंत्र खतरे में है, इसकी चिंता सभी को लगी है, लेकिन भय और दहशत के चलते कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। इस बाबत दो टूक बोलनेवाले को ‘अर्बन नक्सल’ करार देने की एक नई परंपरा शुरू हो गई है। इसी के तहत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राहुल गांधी को अर्बन नक्सल करार दिया है। गांधी ने देश की भ्रष्ट चुनाव व्यवस्था पर सबूतों के साथ हमला बोला है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतने के लिए ‘वोट चोरी’ का खेल खेला गया। गांधी ने खुलेआम प्रेस कॉन्प्रâेंस करके यह धमाका कर दिया कि यह चोरी चुनाव आयोग की आंखों के सामने हुई और चुनाव आयोग चोरों को बचा रहा है। नरेंद्र मोदी ने पिछले ११ सालों में एक भी प्रेस कॉन्प्रâेंस नहीं की है। इस मामले में वे लुका-छिपी में माहिर हैं। गांधी ने बिहार में ‘वोट अधिकार यात्रा’ निकाली। इससे भाजपा के पैरों तले जमीन खिसक गई। गांधी ने देश की जनता को यह विश्वास दिलाया कि भारतीय जनता पार्टी की जीत सरल नहीं है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए नेपाल के युवा सड़कों पर उतरे और उन्होंने भ्रष्ट तानाशाह राज व्यवस्था को उखाड़ फेंका। जैसे ही गांधी ने उन्हें इस क्रांति की याद दिलाई, फडणवीस ने गांधी को एक अर्बन नक्सल करार दे दिया। फडणवीस ने चिंता जताई कि गांधी अर्बन माओवादियों की भाषा बोल रहे हैं। उनके सभी सलाहकार अर्बन माओवादी विचारधारा के हैं। फडणवीस के बयान भ्रमित मानसिकता से निकले हैं। अगर गांधी एक अर्बन नक्सली ठहराए जा रहे हैं तो भारत की वर्तमान विदेश नीति जो
‘माओ’ वाद की ओर झुक
रही है इसका क्या करें? माओ का देश चीन है। चीन में आज भी माओ की प्रतिष्ठा है। अगर यह सच है कि चीन आज भी माओ के विचारों पर चलता है तो ट्रंप की ठोकरों के कारण प्रधानमंत्री मोदी माओ के चीन से हाथ मिलाते दिख रहे हैं। चीन से हाथ मिलाने के कारण क्या प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर को भी माओवादी और अर्बन नक्सल करार दिया जाएगा? माओ का चीन अब भारत का मित्र बन गया है और भाजपा के विदेश नीति के पंडित दिन-रात ‘माओ माओ’ कर रहे हैं। यूरोप और दुनिया में एक के बाद एक कम्युनिस्ट शासन का पतन हुआ है, लेकिन चीन का कम्युनिस्ट शासन मजबूत है। वहां भ्रष्टाचार करनेवाले मंत्रियों को गायब कर दिया जाता है और वोटों की चोरी, वोट की खरीद-फरोख्त और ऐसी ही अन्य चीजें वहां बर्दाश्त नहीं की जातीं। माओवादियों के मन में क्रांतिकारी विचार जागृत होते हैं और जब ऐसे क्रांति करनेवाले हथियार उठाते हैं तो वे नक्सली बन जाते हैं। नक्सली आंदोलन जाति व्यवस्था, शासकों द्वारा की जाने वाली बेतहाशा लूट, भ्रष्टाचार और जमीन के मालिकाना हक के खिलाफ शुरू हुआ था। गरीबों का शोषण ही इसका कारण है। अगर भाजपा की नीति यह है कि प्रधानमंत्री देश के ८० फीसदी गरीबों को १० किलो अनाज देते हैं और बदले में ये गरीब लोग मोदी की जय-जयकार करें तो ऐसे शोषण के खिलाफ नक्सली क्रांति की चिंगारी उसी समय पश्चिम बंगाल में भड़क उठी थी। आजादी की लड़ाई में भाजपा, मोदी और फडणवीस का सहभाग नहीं था। अगर उनके हाथ में होते तो ये लोग ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन और असहयोग आंदोलन को ‘अर्बन नक्सल’ करार दे देते।
इमरजेंसी को लेकर
ये हमेशा स्यापा करते रहते हैं, लेकिन चरण सिंह, जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने उस दौरान पुलिस और सेना को सरकार के आदेश न मानने के लिए उकसाया था। यह भाषा संविधान के अनुरूप नहीं है। जॉर्ज फर्नांडिस ने तो बड़ौदा में बम बनाने की पैâक्ट्री भी खोली थी तो क्या इसे भी ‘अर्बन नक्सल’ कहा जाना चाहिए? हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए और किसान विरोधी चार काले कानूनों को रद्द करने के लिए गर्मी, हवा और बारिश में दिल्ली की सीमा पर बैठे रहे। इसमें हजारों किसान मारे गए। भाजपा यह भी हंगामा कर रही थी कि इस आंदोलन में आतंकवादियों और नक्सलियों की घुसपैठ हो गई है इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए कि श्री फडणवीस कहते हैं कि वोट चोरी के खिलाफ आंदोलन अर्बन नक्सलियों का है। माओ की भूमिका थी कि देश की संपत्ति किसी एक व्यक्ति या समूह के हाथों में नहीं होनी चाहिए। आज भारत में सारी संपत्ति के मालिक एक या दो लोग हो गए हैं और प्रधानमंत्री मोदी सार्वजनिक संपत्ति भी इन्हीं लोगों की झोली में डाल रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री फडणवीस ने महाराष्ट्र की वन संपदा, खदानें, पहाड़, जंगल, मुंबई में जमीन के प्लॉट और झोपड़पट्टी पुनर्विकास की परियोजनाएं भाजपा परिवार के एक या दो लोगों को ही दे दीं। इसके खिलाफ लोगों के दिलों में गुस्सा है। जब लोग गुस्से में सड़कों पर उतरें तो उन पर गोली चला दी जाए इसीलिए ही यह ‘माओ’ और ‘अर्बन नक्सल’ का रोना-धोना शुरू है। हुक्मरानों के मन में यह डर साफ दिख रहा है कि भारत के युवा नेपाल की तरह बगावत कर देंगे और उनके साम्राज्य को उखाड़ फेंकेंगे। इसलिए सरकार ने आतंक और धमकियों का दौर शुरू कर दिया है। अच्छा है। सरकार लोगों से डरने लगी है, क्या यह कम है?
