मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय :  महाराष्ट्र की सहकारिता... गुजरात का गुलाम!

संपादकीय :  महाराष्ट्र की सहकारिता… गुजरात का गुलाम!

भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी पार्टी है, जो दूसरों की बनाई लकीरों पर अपनी राजनीति चमकाती है। दूसरे शब्दों में दूसरों के चूल्हे पर रोटी सेंकती है। देश की आजादी की लड़ाई में, और उसके बाद देश के निर्माण में इन लोगों का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रहा। यही वजह है कि कृषि, सहकारिता (को-ऑपरेटिव) और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में इन लोगों ने कुछ भी ठोस या बड़ा खड़ा किया हो, ऐसा कोई रिकॉर्ड इतिहास में नहीं है। पहले के लोगों ने जो संस्थागत और रचनात्मक काम करके रखा था, बस उस पर कब्जा करना और वहां अपने प्यादों को बिठा देना, फिलहाल यही इनका एकमात्र काम पूरे जोर-शोर से चल रहा है। सहकारिता क्षेत्र इसका सबसे ताजा और जीता-जागता उदाहरण है। सहकारिता क्षेत्र की बुनियाद महाराष्ट्र की धरती पर रखी गई थी। देश की पहली सहकारी चीनी मिल महाराष्ट्र में ही खड़ी हुई। इसके बाद पूरे राज्य में सहकारिता का एक मजबूत जाल फैल गया। इसमें चीनी मिलें, सूत मिलें, दुग्ध उत्पादक संघ, भेड़-बकरी पालन, सब्जी और कृषि उत्पादों के लिए काम करने वाली तमाम सहकारी संस्थाएं और सहकारी बैंक निर्माण करने में कांग्रेस का ही योगदान है। इसी आंदोलन से जहां एक तरफ ‘सहकार महर्षि’ (सहकारिता के संत) पैदा हुए तो दूसरी तरफ ‘सहकार सम्राट’ भी बने। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राजनीति की कमान इन्हीं लोगों के हाथों में गई। लेकिन जब से मोदी-शाह का राज आया है, महाराष्ट्र के सहकारिता क्षेत्र पर गुजरात कब्जा करता जा रहा है और राष्ट्रीय सहकारिता आंदोलन से महाराष्ट्र को जान-बूझकर किनारे कर दिया गया है। रोहित पवार और उनका परिवार बरसों से सहकारिता क्षेत्र में है। उन्होंने एक बेहद गंभीर मुद्दा उठाया है। उनका कहना है, ‘देश के सहकारिता क्षेत्र में बेहद अहम भूमिका निभाने वाली इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड ‘इफको’, नेशनल एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ‘नाफेड’ और नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड ‘एनडीडीबी’ जैसी शीर्ष सहकारी संस्थाओं पर बढ़ता हुआ गुजरात का दबदबा महाराष्ट्र के हित में कतई नहीं है। जिस महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन का जन्म हुआ, वही महाराष्ट्र आज सहकारिता के मामलों में गुजरात के लोगों के फैसलों पर निर्भर हो रहा है। महाराष्ट्र के
सहकारिता क्षेत्र को कमजोर
करने की यह एक बहुत बड़ी साजिश दिखाई दे रही है। श्री रोहित पवार की इस बात में पूरा दम है। सहकारिता पूरी तरह से राज्य का विषय है। इससे जुड़े पैâसले कल तक महाराष्ट्र में ही होते थे। वसंतदादा पाटील, यशवंतराव मोहिते, शंकरराव मोहिते-पाटील, राजारामबापू पाटील और शरद पवार जैसे नेताओं ने इस सहकारी आंदोलन को ताकत दी। सहकारिता में आधुनिकता आए, इसके लिए ‘वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट’ और ‘साखर संघ’ जैसी संस्थाएं बनाई गर्इं और सहकार को मजबूती दी गई। जिला सहकारी बैंकों और शिखर बैंकों का नेतृत्व इन लोगों ने संभाला। लेकिन आज, महाराष्ट्र सहकारिता के मामले में भाजपा के पैरों का दास बन चुका है। गृह मंत्री अमित शाह ने केंद्र में अलग से सहकारिता मंत्रालय बनाया और खुद ही सहकारिता मंत्री बन बैठे। भारतीय सहकारिता क्षेत्र की पूरी कमान अब उन्हीं के हाथों में है। अमित शाह के सहकारिता मंत्री बनते ही दिल्ली की तमाम केंद्रीय सहकारी संस्थाओं पर गुजरात के चहेते लोगों को बिठा दिया गया। नाफेड के अध्यक्ष पद पर जेठाभाई अहीर, नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के चेयरमैन पद पर मितेश शाह, ‘इफको’ के चेयरमैन पद पर दिलीप संघानी, तो प्रबंध निदेशक के पद पर के. जे. पटेल और नाफेड के निदेशक के रूप में मोहनभाई कुंडारिया जैसे तमाम गुजरात के लोगों को नियुक्त कर दिया गया। इस तरह देश के सहकारिता का भविष्य पूरी तरह गुजरात के हाथों में सौंप दिया गया। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर भारत सहित अन्य राज्यों में भी सहकारिता क्षेत्र बहुत बेहतरीन काम करता है। फिर केंद्र की इन बड़ी संस्थाओं पर महाराष्ट्र या दूसरे राज्यों के लोगों को क्यों नहीं बिठाया गया? इन्हीं सहकारी संस्थाओं का इस्तेमाल करके महाराष्ट्र के पूरे सहकारिता क्षेत्र और चीनी मिल मालिकों को भाजपा ने अपनी तरफ खींच लिया और कांग्रेस द्वारा खड़े किए गए इस पूरे साम्राज्य पर बना-बनाया कब्जा जमा लिया। महाराष्ट्र के सहकारिता उद्योगों को पहले अपने कामों के लिए कभी दिल्ली के चक्कर नहीं काटने पड़ते थे। लेकिन आज, चीनी मिल मालिकों को
अमित शाह के दरवाजे
पर ‘वेटिंग’ में रहना पड़ता है। अगर कोई थोड़ा भी विरोध में गया, तो मिलों पर तुरंत नोटिस वगैरह ठोककर उन्हें बेजार कर दिया जाता है। नतीजा यह है कि अपनी संस्थाएं बचाने के लिए विखे-पाटील, काले, कोल्हे, पाटील, भोसले, मोहिते, तनपुरे, तांबे जैसी इस क्षेत्र की तमाम रईस और रसूखदार मंडलियां आज भाजपा के गोदाम की शरण में जाकर दुबकी बैठी हैं। महाराष्ट्र की कई चीनी मिलें इस वक्त भारी आर्थिक तंगी से गुजर रही हैं। अगर उन्हें कोई कर्ज या मदद चाहिए तो अमित शाह और इस गुजराती मंडली की ‘कृपा-दृष्टि’ होना अनिवार्य है, आज कुल मिलाकर यही स्थिति है। विपक्षी दलों के विधायक, सांसद और अब सहकारी संस्थाएं भी निगली जा रही हैं। सहकारिता क्षेत्र का पूरा संतुलन ही बिगाड़ दिया गया है। इस क्षेत्र को राष्ट्रीय प्राथमिकता देने के बजाय सिर्फ गुजरात को प्राथमिकता दी जा रही है। महाराष्ट्र के सहकारिता आंदोलन को पंगु बनाकर गुजरात को सहकारिता की राजधानी बनाने की केंद्र की यह नीति, सीधे तौर पर मराठी राज्य के स्वाभिमान पर करारा प्रहार है। महाराष्ट्र के सहकारिता आंदोलन ने पूरे देश का मार्गदर्शन किया और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रफ्तार दी। आजादी की लड़ाई में शामिल रहे कई बड़े घराने आगे चलकर सहकारिता से जुड़े। गुजरात के वैकुंठभाई मेहता सहकारिता क्षेत्र का एक बहुत बड़ा नाम हैं। उनके नाम पर पुणे में ‘वैकुंठभाई मेहता सहकारी राष्ट्रीय संस्थान’ खड़ा है। यह भव्य संस्थान सहकारिता क्षेत्र के एक ‘विश्वविद्यालय’ के रूप में काम कर रहा है। इसके बावजूद, देश की पहली ‘सहकारी यूनिवर्सिटी’ गुजरात में स्थापित की जा रही है। ‘गोकुल’ जैसी सहकारी संस्थाओं को अपने कब्जे में लेने की अंदरूनी हलचलें तेज हैं। ‘महानंदा’ जैसी संस्था की २७ एकड़ जमीन पर तो पहले ही टेढ़ी नजर गड़ चुकी है। कुल मिलाकर, महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने वाले इस सहकारिता क्षेत्र को गुजराती लॉबी का गुलाम बनाने की साजिश अब मुकाम तक पहुंचती दिख रही है। और अफसोस, महाराष्ट्र अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर यह सब चुपचाप देखने को मजबूर है।

अन्य समाचार