महाराष्ट्र में चल रहे नगरपालिका और नगर पंचायत चुनाव अराजकता में बदल गए हैं। चुनाव की तारीखों से लेकर नतीजों की तारीखों तक, मतदाता सूची में गड़बड़ी से लेकर मतदान तक और सत्ताधारी दलों द्वारा प्रचार में दिखाए गए प्रलोभनों से लेकर लाखों रुपए की नकदी जब्त होने तक, सबकुछ गड़बड़झाला है। दो दिन पहले ही चुनाव आयोग ने खुद १२ जिलों में चुनाव ऐन वक्त पर आगे धकेल दिए। अदालती कारणों का हवाला देते हुए, उसने घोषणा की कि इन जिलों में मतदान २० दिसंबर को और मतगणना २१ दिसंबर को होगी। अब, उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने पैâसला दिया है कि राज्य की सभी नगरपालिकाओं और नगर पंचायतों के लिए मतगणना एक ही दिन, यानी २१ दिसंबर को होगी। न्यायालय ने यह पैâसला उसके समक्ष दायर कुछ याचिकाओं के संबंध में दिया। मूल टाइम टेबल के अनुसार, राज्य में २४६ नगरपालिकाओं और ४२ नगर पंचायतों के चुनाव के लिए मतदान २ दिसंबर को और मतगणना ३ दिसंबर को होनी थी। हालांकि, चुनाव आयोग के पैâसले ने १२ जिलों में मतदान २० दिसंबर और मतगणना २१ दिसंबर तक के लिए बढ़ा दिया है। इसके बाद, अदालत के पैâसले ने २ दिसंबर को हुए मतदान के परिणामों को आगे बढ़ा दिया है, जो ३ दिसंबर को घोषित किया जाना था, २१ दिसंबर तक के लिए। चुनाव आयोग ने मतदान से ठीक दो दिन पहले ‘चुनावी प्रक्रिया में अनियमितताओं’ का हवाला देते हुए १२ जिलों में चुनाव आगे बढ़ा दिए थे। अब, अदालत ने
‘पारदर्शिता’ का हवाला देते हुए
मतगणना आगे बढ़ा दी है। भले ही चुनाव आयोग और अदालत ने अपनी-अपनी दलीलें दे दी हैं, लेकिन इस बात से वैâसे इनकार किया जा सकता है कि इससे पहले से चल रही गड़बड़ी और बढ़ गई है? जो चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया का संचालन करता है वही आयोग कबूल करता है कि कुछ जगहों पर प्रक्रिया ‘अनियमित’ हो गई है। इसी वजह से वह वहां चुनाव आगे धकेलने में जल्दबाजी करता है और गड़बड़ी बढ़ाता है। आयोग की यह आगे धकेलना तब संदिग्ध ही था जब हर जगह वास्तविक मतदान की तैयारियां हो रही थीं। अब मतगणना आगे धकेलने का अदालत का पैâसला निश्चित रूप से चिंता का विषय है, खासकर विपक्षी दलों के लिए। भाजपा मतदाता सूची से लेकर वास्तविक मतदान तक, पूरी प्रक्रिया में गड़बड़-घोटाला करने में ‘मास्टर’ है। ऐसे में, कौन और वैâसे सुनिश्चित कर सकता है कि मंगलवार को जिन वोटिंग मशीनों पर मतदान हुआ, वे १९ दिनों तक ‘सुरक्षित’ रहेंगी और उनमें कोई भी छेड़छाड़ नहीं होगी? विधानसभा चुनावों में हुआ गड़बड़-घोटाला सभी ने देखा है। मौजूदा नगरपालिका और नगर पंचायत चुनावों में भी तीनों सत्तारूढ़ दलों, खासकर भाजपा ने, खुले तौर पर साम, दाम, दंड, भेद का रास्ता अपनाया ही है। चुनाव से ठीक पहले इस मंडली से लाखों की नकदी और पैसों से भरे बैग बरामद होने के मामले सामने आए। यह मंडली सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। मुख्यमंत्री ने चुनावी सभाओं में ‘नीति, नियम और धन’ पर
प्रवचन
झाडे। उन्होंने चुनाव आयोग और अदालत के ताजा फैसले पर गहरी नाराजगी जताई है, लेकिन क्या गारंटी है कि धकम पेल का यह गड़बड़-घोटाला भाजपा की राह पर चल रही इस ऊहापोह की गंदगी को उखाड़ फेंकने की कोशिश नहीं होगी? मुख्यमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि नीति-नियमों को ताक पर रखा जा सकता है और निधि की कोई कमी नहीं है। यह सही है कि राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों के घोड़े तीन-साढ़े तीन साल बाद चुनावी गटर गंगा में गए हैं, लेकिन यह पूरी प्रक्रिया शुरू से ही संदेह के घेरे में रही है। महाराष्ट्र में नगरपालिकाओं और नगर पंचायतों के चुनाव में मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और वहीं पर डुप्लीकेट वोटर्स की गड़बड़ी, आरक्षण की सीमा पार करने के कारण कुछ जगहों के नतीजों पर सुप्रीम कोर्ट की लटकती तलवार, खुद चुनाव आयोग द्वारा १२ जिलों में चुनाव प्रक्रिया को ‘अवैध’ मानने, वहां आगे धकेले गए मतदान, सत्ताधारी दल के घरों और कारों में मिले लाखों रुपए, हाई कोर्ट द्वारा आगे बढ़ाई गई मतगणना के बीच जारी हैं। मुख्यमंत्री की ‘नीति-नियमों’ की रोशनी तले केवल भ्रम, गड़बड़ी और संदेह का ही अंधेरा है। सत्ताधारी दल इसी अंधेरे का फायदा उठाकर ‘ईवीएम घोटाले’ कर सकता है। जो मंडली चुनाव में घोटाला करके ही सत्ता में आई है उन पर भरोसा करें तो कैसे? नगरपालिका और नगर पंचायत चुनाव पूरी तरह से गड़बड़झाला बन गए हैं। मतदान और मतगणना १९ दिन आगे धकेले जाने से लोकतंत्र के लिए रात ही नहीं, बल्कि दिन भी बैरियों का होगा!
