विद्या का मायका और सुसंस्कृत नगरी के तौर पर मशहूर पुणे शहर पर आज आपराधिक गिरोहों ने कब्जा कर लिया है। पुणे में कानून-व्यवस्था की स्थिति खतरे के निशान को पार कर चुकी है। पुणे की सड़कों पर दिनदहाड़े गुंडे गोलियां चलाते हैं, तलवार और कोयते (दरांती) लहराकर एक-दूसरे की जान लेते हैं। यह सब दिन के उजाले में होता है, लेकिन पुणे पुलिस ने रात १० बजे के बाद ‘पुणे के सार्वजनिक जीवन बंद’ करने का फरमान जारी कर दिया है। पुणे के तमाम हॉकर्स, जिन्हें रात १० बजे तक ही हॉकर्स लाइसेंस की अनुमति है, वे सभी हॉकर्स, फूड स्टॉल और खाऊ-गली के स्टॉल १० बजे बंद हो जाएंगे। पान की टपरियां (दुकानें) आदि सब कुछ १० बजे के बाद बंद हो जाएंगे, ऐसा आदेश पुणे के पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार ने जारी किया है। पुणे की जनता और मजदूर वर्ग पर थोपे गए ये प्रतिबंधात्मक आदेश हैं। पुणे हाल के दिनों में अपराधियों और गुंडा गिरोहों का गढ़ किसकी वजह से बना? पुणे के लैंड माफिया और हफ्ता वसूलने वालों को पिछले १५-२० सालों से सत्ताधारियों का संरक्षण मिल रहा है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए गुंडा गिरोह पाले गए और इन्हीं गिरोहों की मदद से चुनाव लड़ने का तंत्र सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपना लिया। गुंडा गिरोहों को प्रतिष्ठा देने का काम पुणे के प्रमुख राजनेताओं ने किया। पुणे को सामाजिक विचारों और सामाजिक कार्यों की एक बड़ी विरासत हासिल है। लेकिन अब गुंडों-हत्यारों को ‘वाशिंग मशीन’ में धोकर समाज सेवक बनाया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी और अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस ने तो इस मामले में हद ही कर दी। इस पार्टी के पुणे के विधायकों और नगरसेवक मंडलियों का कारनामा आपराधिक क्षेत्र में जितना ‘तेजस्वी’ है, उतना तो शिकागो के माफिया गिरोहों का भी नहीं रहा होगा। इसीलिए पुणे के राजनेता, सत्ताधारी और बिल्डर्स, इस त्रिकुट को एक सुसंस्कृत शहर को पूरी तरह बर्बाद करने का अपयश लेना ही चाहिए। इसी के परिणामस्वरूप,
पुणे की कानून-व्यवस्था
पूरी तरह ध्वस्त हो गई और पुलिस को रात १० बजे ‘पुणे बंद’ का आदेश जारी करना पड़ा। इसके लिए पुलिस नहीं, बल्कि सत्ताधारी जिम्मेदार हैं। पुणे में अब रात १० बजे के बाद सन्नाटा पसरा रहेगा। पुणेकरों को अपने घरों में ही कैद रहना पड़ेगा। यह जुल्म क्यों? यह सवाल पुलिस से पूछने के बजाय पुणे के पालक मंत्री, मंत्रियों और विधायकों से पूछा जाना चाहिए। पुणे की मौजूदा भयानक स्थिति यहां के माफिया छाप राजनेताओं की देन है। गृहमंत्री फडणवीस जब कभी पुणे में भाषण देने आएं, तो वहां के सामाजिक क्षेत्र के बचे-खुचे लोगों को फडणवीस से मिलकर यह जवाब मांगना चाहिए कि ‘हमारे पुणे को कहां लाकर खड़ा कर दिया?’ फडणवीस गृहमंत्री हैं। पुणे के गुंडा गिरोहों को जिन्होंने राजनीतिक संरक्षण दिया, उन बड़े लोगों को सीधा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी। अजीत पवार के कार्यकाल में बिल्डर्स और लैंड माफिया के गठजोड़ को बढ़ावा मिला। इसी से वर्चस्व की लड़ाई शुरू हुई। हर गिरोह ने अपना-अपना राजनीतिक दल चुना और संरक्षण हासिल किया। उन गुंडा गिरोहों और उनके सरगनाओं के नाम लेकर हमें इस कॉलम को अपवित्र नहीं करना है, लेकिन जेल में बैठकर भी ये लोग अपना धंधा चला रहे हैं। पुणे की सड़कों को खून से नहला रहे हैं। सत्ताधारी दल के विधायक ऐसे लोगों की मदद के लिए पुलिस स्टेशन जाते हैं, यह ‘पोर्श’ कार हादसे के मामले में पूरे महाराष्ट्र ने देखा है। पुणे महानगरपालिका में ऐसे गुंडों और उनके आकाओं का दखल बढ़ गया है। पुणे के पुलिस कमिश्नर ने इक्का-दुक्का गुंडों की ‘परेड’ कराकर पब्लिसिटी तो बटोर ली, लेकिन जब तक इनके ‘बापों’ (आकाओं) का जुलूस नहीं निकाला जाता, तब तक पुणे की गुंडागर्दी और झुंडशाही (भीड़तंत्र) पर लगाम नहीं कसी जा सकती। देवेंद्र फडणवीस गृह मंत्रालय का कामकाज अपनी सहूलियत के हिसाब से चलाते हैं। वे केवल अपने लोगों का फायदा देखते हैं। पुलिस भाजपा के लोगों की मदद करे और पार्टी बढ़ाने में हाथ बंटाए, अगर गृहमंत्री का यही रवैया रहा, तो
गुंडों का राज ही
कानून का राज बन जाता है। पुणे और आस-पास के इलाकों में महिलाओं पर अत्याचार, मासूमों से बलात्कार और हत्या, अपहरण तथा गैंगवॉर जैसी घटनाएं बढ़ गई हैं। लोग गुस्से में सड़कों पर उतरते हैं और फिर शांत हो जाते हैं। अब रात १० बजे के बाद पुणेकरों को शांत होकर सो जाना होगा, क्योंकि रात गुंडों की है। सांसद सुप्रिया सुले ने पुणे की इस ‘रात बंदी’ पर चिंता जताई है। उनका सवाल है कि ‘छोटे व्यापारियों के पेट पर लात मारकर पुलिस क्या साबित करना चाहती है?’ कई लोगों की आजीविका का यह सवाल बेहद गंभीर है। जब पुणे में ‘कोयता गैंग’ का आतंक मचा था, तब भी सुप्रिया सुले ने पुलिस से सख्त कार्रवाई की उम्मीद की थी। लेकिन जब गृह मंत्रालय के सरदार ही कोयतों (हथियारों) के सप्लायर बन जाएं तो बेचारी पुलिस क्या करेगी? पुणे में संघ परिवार का जाल फैला हुआ है। उसके जरिए उन्होंने साहित्य परिषद जैसी सांस्कृतिक संस्थाओं पर भीड़तंत्र के बल पर कब्जा कर लिया। यह भी एक तरह का सामाजिक ‘कोयता गैंग’ का ही हुड़दंग है। कोयता गैंग सिर्फ पुणे की सड़कों पर ही उत्पात नहीं मचा रहा है, बल्कि ये कोयते पुणे के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक ठिकानों में भी घुस चुके हैं और उन पर कब्जा कर रहे हैं, जो कि और भी ज्यादा चिंता का विषय है। सांसद सुप्रिया सुले को इस कोयतेबाजी पर भी कड़ा रुख अपनाना चाहिए। पुणे का सामाजिक माहौल पूरी तरह से दूषित हो चुका है। लैंड माफिया, बिल्डर्स, जमीनों का सौदा करने वाले लोग और सरकार से काम करवाने वाले दलालों के लिए पुणे स्वर्ण भूमि बन गया है। इस स्वर्ण भूमि की रक्षा के लिए ‘गुंडों’ की सुरक्षा चाहिए। पहले चार आने की खादी और सिर पर गांधी टोपी पहनकर ऐसी समाज सेवा की जा सकती थी, लेकिन अब माथे पर तिलक, कंधे पर केशरी गमछा और महंगी गाड़ियों से उतरने वाले लड़के-वड़के पुणे के संस्कृति रक्षक बन बैठे हैं। इसका सीधा नतीजा पुणे की मौजूदा बदहाली है। पुणे में आज भी महान विभूतियों को ‘तिलक पुरस्कार’ और ‘पुण्यभूषण पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाता है। इनमें से अधिकांश पुरस्कार विजेता पुणे के बाहर के होते हैं, क्योंकि पुणे में अब उस कद के महान लोग बचे ही नहीं हैं। फिर भी, ‘पुण्यभूषण’ की तर्ज पर पुणे में अब ‘गुंडभूषण’ (गुंडाभूषण) पुरस्कार की शुरुआत की जानी चाहिए। पुणे के गुंडों का समर्थन करने वाले सांसदों, विधायकों, नेताओं और पुलिस अधिकारियों को यह पुरस्कार रात १० बजे के बाद के एक समारोह में दिया जाना चाहिए। पहले पुरस्कार के लिए राज्य के गृहमंत्री के नाम पर विचार होना चाहिए, अगर वे न होते, तो आज का यह खौफनाक पुणे अस्तित्व में ही नहीं आता। ‘पुण्यभूषण’ से ‘गुंडभूषण’ तक का पुणे का यह पतन बेहद चिंताजनक है।
