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संपादकीय : जीत के बाद वाले बुलबुले… यहां भी हॉर्स ट्रेडिंग?

सी. पी. राधाकृष्णन बहुमत से उपराष्ट्रपति चुने गए। भाजपा और उसके लोग इस बात का ढोल पीटने लगे हैं कि यह कितनी बड़ी जीत है। एक ओर, ‘एनडीए’ के ​​पास पहले से ही चालीस का बहुमत था और चूंकि उनके पास असीमित सत्ता और धन था इसलिए उन्होंने उपराष्ट्रपति चुनाव में इसका इस्तेमाल किया। सभी विपक्षी दलों के उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी को ३०० वोट मिले। विपक्षी दलों के पास कुल ३१५ वोट थे। १५ वोट अवैध घोषित किए गए। इनमें से अधिकांश वोट सुदर्शन रेड्डी के पक्ष में जाने वाले थे, लेकिन तकनीकी त्रुटियां बताकर वोट रद्द कर दिए गए। यानी, यह संदेह है कि ज्यादा से ज्यादा दो से पांच वोट इधर-उधर हो गए होंगे। ऐसे बड़े चुनावों में हमेशा ऐसा होता रहा है। बीजू जनता दल, भारत राष्ट्र समिति आदि दलों ने जांच एजेंसियों के डर से हमेशा की तरह अपनी मिट्टी पलीद की और वोट देने के बजाय तटस्थता का रास्ता अपनाया। यह संविधान के खिलाफ है। राधाकृष्णन की जीत के बाद महाराष्ट्र में भाजपा के भाड़े के टट्टुओं ने ‘क्रॉस वोटिंग’ की बात करनी शुरू कर दी है। कहते हैं कि महाराष्ट्र के अलाणे-फलाणे सांसदों ने क्रॉस वोटिंग की। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हमेशा की तरह राधाकृष्णन की जीत का श्रेय लिया। उन्होंने टिप्पणी की कि महाविकास आघाड़ी अपने ही वोटों को बरकरार नहीं रख पाई, वगैरह। शिंदे गुट के लोगों का कहना है कि महाविकास आघाड़ी में फूट डालकर हमने सांसदों के वोट राधाकृष्णन की तरफ मोड़ दिए। अगर इन लोगों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने
देश के संवैधानिक पद,
यानी उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में इस तरह से हॉर्स ट्रेडिंग की है, तो क्या भारत का चुनाव आयोग खर्राटे भर रहा है? चुनाव आयोग उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में भी गंभीरता से काम नहीं करता। यहां भी वोट चोरी का खेल होने दिया जा रहा है। अगर मान लिया जाए कि ऐसा सचमुच हुआ है तो संघ के उम्मीदवार सी. पी. राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति पद पर चुनाव वोट चोरी के जरिए हुआ है। इसके लिए काले धन, ब्लैकमेलिंग और धमकियों का इस्तेमाल किया गया। भाजपा जो ग्राम पंचायत, जिला परिषद और विधानसभा चुनावों में करती है, वही उसने उपराष्ट्रपति चुनाव में भी किया। देश के पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ इस्तीफे के बाद गायब हो गए। नए उपराष्ट्रपति चुने जाने के बावजूद, श्रीमान धनखड़ प्रकट नहीं हुए हैं। ‘एनडीए’ में कोई भी इस गंभीर मुद्दे पर अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं है। कम से कम नवनियुक्त उपराष्ट्रपति को इस अदृश्य मसले पर प्रकाश डालना चाहिए। उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक प्रतिष्ठा का पद है इसलिए इसकी प्रतिष्ठा बनी रहनी चाहिए, लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा सी.पी. राधाकृष्णन की जीत का ढोल पीट रही है। वोटों की जीत का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। वोटों के विजयी आंकड़े नचाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इसे तोड़ा गया, उसे तोड़ा गया। यह सब उस पद की गरिमा को कम कर रहा है। जब मतदान पूरी तरह से गुप्त होता है तो भाजपा काल में इतने महत्वपूर्ण चुनाव में
‘वोटों’ को तोड़ना
कितना आसान हो गया है, यह इस बार देखने को मिला। बेशक, भाजपा और उसके सहयोगी दल चाहे जितनी भी ‘तोड़-फोड़’ की बात करें, लगता नहीं कि दो-पांच के अलावा किसी और ने बेईमानी का गोबर खाया हो। कहा जा रहा है कि जिन लोगों ने क्रॉस वोटिंग की उन अंतरात्मा के आत्माराम ने तुरंत परदेश गमन किया और उनकी विदेश यात्रा का सारा इंतजाम भाजपा के लाडले उद्योगपतियों ने किया, यह खबर भाजपाई गुट से ही हवा की तरह फैलाई गई। इससे भी उपराष्ट्रपति चुनाव की गरिमा नहीं बनी रहती। संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को निष्पक्ष होकर काम करना चाहिए। नए उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन पर निष्पक्ष होकर काम करने और लोकतंत्र व संविधान का सम्मान बनाए रखने की जिम्मेदारी है। शपथ लेने के बाद उन्हें सबसे पहले राष्ट्रहित में एक काम करना चाहिए। वह यह कि अगर सत्ताधारी दल राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों के चुनाव में विधायकों की हॉर्स ट्रेडिंग कर रहा है तो उसे रोकने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। एक ओर ऐसे चुनावों से कोई भी दूर नहीं रह सकता और यह सुनिश्चित करने का प्रावधान किया जाना चाहिए कि यह मतदान भी खुले तौर पर हो। एक ओर मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग हो रही है, वहीं दूसरी ओर संसद में चुनी गई पार्टियां ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ में शामिल होकर तटस्थता का सौदा करके मतदान का बहिष्कार कर रही हैं। ऐसी पार्टियों की मान्यता रद्द कर देनी चाहिए। सी. पी. राधाकृष्णन इस सब पर गंभीरता से विचार करेंगे। बेशक, कुर्सी पर बैठने के बाद ही इंसान अपना असली रंग दिखाता है। नए उपराष्ट्रपति का रंग कैसा है, वह जल्द ही पता चल जाएगा।

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