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संपादकीय : सरसंघचालक की कृष्णभावना!

प्रधानमंत्री मोदी इन दिनों उज्बेकिस्तान और अन्य देशों में हैं, तो सरसंघचालक मोहन भागवत ‘ट्रंप’ देश यानी न्यूयॉर्क में हैं। भागवत के अमेरिका दौरे का वहां के कई संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने विरोध किया। भागवत को मिला यह विरोध मोदी-शाह की धर्मांधता और निर्दयी राजनीति का विरोध है। महात्मा गांधी के हत्यारे हमारी धरती पर कदम न रखें, ऐसे नारे भागवत के आगमन के समय लगाए गए। भारत के बाहर संघ की छवि धर्मों में भेद करने वाली और महात्मा गांधी के हत्यारों के तारणहार जैसी ही है और मोदी-शाह के भारत पर कब्जा करने के बाद से संघ को इस आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका के कई हिंदू संगठनों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि, ‘‘भागवत या संघ अमेरिका के हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते।” भागवत के आगमन का न्यूयार्क के मेयर ममदानी ने विरोध किया। मेयर ममदानी का कहना है कि भागवत का कार्यक्रम सरकारी नहीं है इसलिए मैं इसे रोक नहीं सकता। कुल मिलाकर भागवत का अमेरिका दौरा विवादों में घिरने के बावजूद उन्होंने अपने तयशुदा कार्यक्रम पूरे किए, भाषण वगैरह निपटाए। भागवत ने अमेरिका में जो बातें रखीं, वे भारत के उनके समर्थकों और मोदी के अंधभक्तों को कतई रास आने वाली नहीं हैं। ‘‘अगर किसी हिंदू को यह लगता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू ही नहीं है। अगर आपको खुद को हिंदू कहलवाना है तो सभी रास्ते एक ही मंजिल की तरफ ले जाने वाले हैं और हर इंसान की अपनी प्रतिष्ठा है, इस पर आपका विश्वास होना चाहिए।”, ऐसे भव्य और दिव्य विचार सरसंघचालक ने अमेरिका में रखे। संघ की ओर से हमारा ऐसा विश्वास है कि पूरी मानवता एक ही है, ऐसा भी भागवत बोले। भागवत ने न्यूयॉर्क के ‘इस्कॉन’ मंदिर के दर्शन किए। बेघरों के लिए
अन्न वितरण के कार्यक्रम में
हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने कृष्ण उपदेश दिया। उनका कहना है, ‘‘आज दुनिया में कई संघर्ष हैं, कई अंतर्विरोध हैं, लेकिन इन सबको एक करने वाली इकलौती चीज चेतना है। वह चेतना यानी कृष्णभावना।” ‘धर्म अलग-अलग, भावना एक’, यह वैश्विक संदेश सरसंघचालक ने अमेरिका की धरती से दिया। भागवत ने अमेरिका जाकर कोई अनोखा काम नहीं किया। वे अमेरिका के लोकतंत्र और कानून के दायरे में रहकर ही नपे-तुले शब्दों में बोले। विविधता में एकता और मानवतावाद पर भागवत ने जो प्रवचन दिए, उनमें अमेरिकी लोगों को कोई दिलचस्पी नहीं है। प्रत्यक्ष में, भारत में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, वह भागवत के विचारों के बिल्कुल विपरीत हो रहा है। भागवत ने भगवान श्रीकृष्ण पर विचार प्रकट किए। इससे सवाल यह उठता है कि क्या इसके बाद श्रीराम की आरती बंद कर दी गई? इन लोगों की नजर में राम का महत्व राजनीतिक रूप से खत्म हो चुका है। राम मंदिर पर जिन्होंने डाके डाले, वे ‘भाजपाई’ और संघ के समर्थक ही हैं। राम मंदिर के निर्माण के लिए अमेरिका के हिंदू समाज ने भारी मात्रा में दान दिया था। उस चंदे की लूट अयोध्या में हुई। इस लूट पर न तो प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ कहा और न ही सरसंघचालक ने। इसलिए अमेरिका की धरती पर भागवत ने श्रीराम के बजाय कृष्ण के विचार रखकर अपनी खाल बचा ली। दुनिया में कई संघर्ष चल रहे हैं और अगर इस विचार को सही मान लिया जाए कि वे कृष्ण के उपदेश से खत्म होंगे, तो फिर इजरायल ने ‘गाजा’ पट्टी में ५० हजार से ज्यादा बच्चों को मार डाला। इस पर संघ ने इंसानियत के प्रति कोई हमदर्दी नहीं दिखाई। उल्टा इस ‘बालसंहार’ करने वाले नेता के गले मिलने का काम कभी संघ प्रचारक रहे मोदी ने किया। ईरान के स्कूल पर बम गिराकर पांच सौ छोटे बच्चों की हत्या के गुनहगार अमेरिका और इजरायल में हैं। इस
नरसंहार पर भी
सरसंघचालक की तरफ से निंदा के दो शब्द बाहर नहीं निकले। कृष्णभावना सत्य, धर्म और न्याय के पक्ष में होती है। वैसी कृष्णभावना अब भारत में बची नहीं है। कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है, ‘‘हे अर्जुन, सच्चा ज्ञान पाने के लिए ज्ञानी लोगों के चरणों में जाओ। उनसे अपने मन की शंकाओं और जिज्ञासाओं के बारे में विनम्रता से सवाल पूछो। सीखने की भावना रखो। तुम्हें सवाल पूछने की स्वतंत्रता है, जिससे तुम्हें ज्ञान की प्राप्ति होगी।” कृष्ण उपदेश यह है कि एक उत्तम गुरु केवल लंबे-चौड़े प्रवचन नहीं झाड़ता, न ही यह मानता है कि सिर्फ मेरा ही सच सही है और मैं ही सही हूं। वह आदेश नहीं देता, बल्कि सवाल को समझता है और सवाल पूछने वाले को चेतना देता है। इसीलिए महाभारत के रणक्षेत्र में भी अर्जुन सवाल पूछता है और श्रीकृष्ण संयम से जवाब देते हैं। यह भारतीय माटी की कृष्णभावना है। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मित्रता और करुणा रखता है, अहंकार पर विजय पाता है और सुख-दुख में समान भाव रखता है, वही श्रेष्ठ ठहरता है।” श्रीकृष्ण के अनुसार, शिक्षा केवल बुद्धि के विकास का नाम नहीं है, बल्कि शिक्षा के साथ-साथ एक उत्तम ‘मनुष्य’ बनना भी उतना ही जरूरी है। भारत का मौजूदा माहौल कृष्ण विचार के बिल्कुल खिलाफ है। दिल्ली और विभिन्न राज्यों के भाजपा शासकों को ऐसा लगता है कि मुसलमानों और ईसाइयों को इस देश में रहना ही नहीं चाहिए और उनका व्यवहार भी ऐसा ही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक सभा के लिए गए थे। उनकी सभा के बाद भाजपा के हिंदुत्ववादियों ने खड़गे की सभा वाली जगह का शुद्धीकरण किया। भाजपा की राजनीति में धर्म, जाति और अमानवीय व्यवहार का अतिरेक है। भागवत ने अमेरिका में जो कृष्णभावना व्यक्त की, क्या ये सारे कुकर्म उसमें फिट बैठते हैं? भारत आकर जरा इस पर भी कुछ बोलिए!

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