मुख्यपृष्ठनए समाचारमोदी-शाह का ‘मिशन यूपी’

मोदी-शाह का ‘मिशन यूपी’

 -योगी बाबा की कुर्सी छिनने से होगी यूपी चुनाव की शुरुआत?
-सी-वोटर सर्वे में यूपी में भाजपा कमजोर, उधर केशव मौर्य की मुख्यमंत्री बनने की खुली इच्छा; -क्या २०२७ से पहले चेहरा बदलने की जमीन तैयार हो रही है?

 अनिल तिवारी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जिस तरह सर्वे, नेतृत्व की चर्चाएं और केशव प्रसाद मौर्य की मुख्यमंत्री बनने की खुली इच्छा एक साथ सामने आई है, उससे भाजपा के भीतर नए शक्ति-संतुलन की अटकलें तेज हो गई हैं। सवाल उठ रहा है कि कहीं २०२७ से पहले योगी आदित्यनाथ को कमजोर दिखाकर नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तो तैयार नहीं की जा रही? २०२४ लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश ने भाजपा की राष्ट्रीय गणित बिगाड़ दी थी। अब यदि उसी हार का ठीकरा योगी नेतृत्व पर फोड़ा जाता है और यह तर्क दिया जाता है कि अगले चुनाव में नया चेहरा जरूरी है, तो सबसे बड़ा लाभ किसे होगा? केशव मौर्य की दावेदारी ने संकेतों को और गहरा कर दिया है। कुल मिलाकर राजनीतिक घटनाक्रम इतना जरूर कह रहा है, योगी बाबा, सावधान रहिए। लड़ाई सिर्फ मजबूत विपक्ष से नहीं, कुर्सी के आसपास भी हो सकती है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अचानक दो घटनाएं एक साथ सामने आई हैं और दोनों को जोड़कर देखने पर भाजपा के भीतर भविष्य के नेतृत्व को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। एक तरफ इंडिया टुडे-सीवोटर के अगस्त २०२६ के सर्वे में उत्तर प्रदेश में एनडीए की स्थिति कमजोर दिखाई गई है, दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने साफ कह दिया है कि उनकी महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री बनने की है और अगली बार लोग उन्हें इस भूमिका में देख सकते हैं। यहीं से राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या दोनों घटनाएं महज संयोग हैं, या २०२७ के चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर सवाल खड़ा करने की जमीन तैयार की जा रही है?

सी-वोटर के मूड ऑफ द नेशन सर्वे में यदि आज लोकसभा चुनाव हों तो उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन को ४१ और एनडीए को ३८ सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। यह सर्वे विधानसभा चुनाव का अनुमान नहीं है, लेकिन राजनीतिक संदेश साफ है, उत्तर प्रदेश में भाजपा पहले जैसी सुरक्षित स्थिति में नहीं दिखाई गई। यही आंकड़ा आगे चलकर एक राजनीतिक तर्क बन सकता है, ‘योगी के नेतृत्व में भाजपा कमजोर हो रही है, इसलिए २०२७ में चेहरा बदलना होगा।’ और ठीक इसी समय केशव प्रसाद मौर्य का यह कहना कि ‘मेरी महत्वाकांक्षा भी मुख्यमंत्री बनने की है’ सामान्य बयान नहीं माना जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अंतिम पैâसला भाजपा नेतृत्व और विधायक दल करेगा। यानी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी अब पर्दे के पीछे की चर्चा नहीं रही, सार्वजनिक बयान बन चुकी है।

उत्तर प्रदेश ने, २०२४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा का पूरा राष्ट्रीय गणित बिगाड़ दिया था। पार्टी को राज्य से अपेक्षित सफलता नहीं मिली और यही सबसे बड़ा कारण बना कि भाजपा अपने दम पर बहुमत के आंकड़े २७२ तक नहीं पहुंच सकी। ‘४०० पार’ का नारा भी उत्तर प्रदेश की हार के साथ ध्वस्त हो गया। एक समय तो तस्वीर इतनी उलझी हुई थी कि यह सवाल तक खड़ा हो गया था कि नरेंद्र मोदी तीसरी बार सरकार बना भी पाएंगे या नहीं। अंतत: सहयोगी दलों के सहारे एनडीए सरकार बनी, लेकिन २०१४ और २०१९ जैसी पूर्ण बहुमत वाली राजनीतिक ताकत भाजपा के पास नहीं रही। यही वजह है कि भाजपा के भीतर २०२४ के उत्तर प्रदेश परिणामों का योगी से हिसाब अभी खत्म हुआ मान लेना जल्दबाजी होगी। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा लंबे समय से है कि दिल्ली वाले तभी से लगातार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटाने के प्रयास में लगे हैं और उसके लिए सबसे उपयुक्त समय अब आ गया है।
अगर २०२७ से पहले योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए जाते हैं, तो उसके पीछे केवल आने वाले चुनाव का गणित ही नहीं, २०२४ की अधूरी राजनीतिक टीस भी देखी जाएगी। सवाल यही है, क्या २०२७ का चेहरा तय करते समय भाजपा केवल भविष्य देखेगी या २०२४ का हिसाब भी चुकता करेगी?
राजनीतिक विश्लेषण का सबसे संवेदनशील हिस्सा यहीं शुरू होता है। योगी आदित्यनाथ यदि २०२७ में तीसरी बार भाजपा को उत्तर प्रदेश की सत्ता दिला देते हैं तो उनका राष्ट्रीय कद और बढ़ेगा। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य है और वहां लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बनना किसी भी नेता को स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय नेतृत्व की अगली कतार में ला सकता है। यही वह बिंदु है, जहां मोदी-शाह और योगी के भविष्य के समीकरणों को लेकर लंबे समय से राजनीतिक अटकलें लगती रही हैं। यह घटनाक्रम सवाल जरूर खड़े करता है। एक तरफ भाजपा के सामने उत्तर प्रदेश में वास्तविक चुनौतियां हैं। २०२४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा उत्तर प्रदेश में केवल ३३ सीटों पर सिमट गई थी, जबकि २०१९ में उसने ६२ सीटें जीती थीं। पार्टी के लिए २०२७ का विधानसभा चुनाव इसलिए भी निर्णायक है। २०२७ का चुनाव केवल भाजपा बनाम समाजवादी पार्टी नहीं होगा। भाजपा के भीतर भी यह तय होगा कि उत्तर प्रदेश का अगला नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा।
योगी की ताकत
योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह उत्तर प्रदेश में भाजपा के सबसे बड़े जनाधार वाले चेहरों में बने हुए हैं। लगातार दो बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पहचान खड़ी की है, जो केवल संगठन या केंद्रीय नेतृत्व के सहारे नहीं टिकती।
२०२४ के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा नुकसान जरूर हुआ, लेकिन इसके बावजूद योगी का राजनीतिक कद खत्म नहीं हुआ। उलटे २०२७ का विधानसभा चुनाव उनके लिए निर्णायक परीक्षा बन सकता है। यदि वह तीसरी बार भाजपा को सत्ता दिलाने में सफल रहते हैं, तो उनका कद उत्तर प्रदेश की सीमा से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में कहीं बड़ा हो जाएगा। यही उनकी ताकत भी है और संभवत: शीर्ष नेतृत्व की चिंता भी।
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य है। यहां लगातार तीसरी जीत किसी भी मुख्यमंत्री को स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों की कतार में खड़ा कर सकती है। योगी की हिंदुत्ववादी छवि, संगठन पर पकड़ और समर्थकों का स्वतंत्र आधार उन्हें भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्रियों से अलग करता है। इसलिए २०२७ की लड़ाई योगी के लिए सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने की नहीं होगी। यह चुनाव तय कर सकता है कि योगी केवल उत्तर प्रदेश के नेता रहेंगे या भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के अगले बड़े शक्ति-केंद्र बनेंगे।
चेहरा बदलने की पटकथा?
संभावित पटकथा कुछ ऐसी हो सकती है, पहले सर्वे के जरिए यह धारणा बने कि भाजपा योगी के नेतृत्व में कमजोर है। फिर जातीय समीकरण का तर्क सामने आए। उसके बाद ओबीसी नेतृत्व के नाम पर केशव मौर्य जैसे चेहरे को आगे करने की मांग उठे। और अंत में कहा जाए कि चुनाव जीतने के लिए ‘सामूहिक नेतृत्व’ या नया चेहरा जरूरी है। यह अभी एक राजनीतिक परिकल्पना है, लेकिन केशव मौर्य के ताजा बयान ने इसे चर्चा के लायक जरूर बना दिया है।
अगर योगी आदित्यनाथ भाजपा के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जा रहे चेहरों में हैं, तो चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद की दूसरी दावेदारी क्यों खुल रही है? और क्या सी-वोटर के कमजोर आंकड़े कल यह कहने का बहाना बनेंगे, ‘योगी के चेहरे पर चुनाव नहीं जीता जा सकता, इसलिए चेहरा बदलना होगा?’ अगर ऐसा हुआ तो २०२७ की सबसे बड़ी लड़ाई भाजपा और विपक्ष के बीच नहीं, भाजपा के अपने घर के भीतर दिखाई दे सकती है।

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