सायोनी घोष जैसी प्रवृत्तियों का क्या किया जाए? यह सवाल आज कई लोगों के जेहन में होगा। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के प्रचार में इसी सायोनी ने अपने धारदार भाषणों से खूब सुर्खियां बटोरी थीं। उनकी एक छवि ‘प्रति-ममता’ के रूप में बन गई थी। हर सभा में वह भाजपा की धज्जियां उड़ा रही थीं और ममता को अपनी माता बता रही थीं। इसलिए जब तृणमूल कांग्रेस के सांसदों में फूट पड़ रही थी, तब कई लोगों का मानना था कि इस फेहरिस्त में सायोनी घोष का नाम नहीं होगा। लेकिन अब ममता के घर के ही पासे पलट गए हैं; सायोनी घोष ने तृणमूल कांग्रेस और ‘ममता माता’ का त्याग कर भाजपा के तंबू में अपना घोड़ा घुसा दिया है। तृणमूल के ‘बेईमान’ सांसदों ने भले ही अपना एक अलग गुट बना लिया हो, लेकिन आज नहीं तो कल उन्हें भाजपा में शामिल होना ही पड़ेगा। सायोनी बंगाल चुनाव का एक बेहद लोकप्रिय और चर्चित चेहरा थीं। उन्होंने जिस तरह का चुनाव प्रचार किया, उसमें ‘दिल में काबा और मदीना’ जैसे गाने शामिल थे। इस गाने पर भाजपा को घोर आपत्ति थी और चुनाव के दौरान भाजपा ने उन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा था कि सायोनी मुसलमानों को रिझाने के लिए ऐसे गाने गा रही हैं। भाजपा ने तब अपने प्रचार में दावा किया था कि उनके ऐसे गानों से हिंदुत्व खतरे में आ गया है। मगर अब, वही ‘दिल में काबा और मदीना’ की सोच लेकर सायोनी खुद हिंदुत्ववादियों के तंबू में जा बैठी हैं। भाजपा में जाने के बाद भी सायोनी काबा और मदीना से अपना प्यार बरकरार रखेंगी और उम्मीद है कि भाजपा को भी अब काबा-मदीना पर कोई आपत्ति नहीं होगी। जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा था, तब राघव की इस बेईमानी पर सायोनी बुरी तरह भड़क गई थीं।
राजनीति में ईमान और नैतिकता
रत्ती भर भी न बचने का दुख उन्होंने जताया था। जब उस वक्त उनसे पूछा गया था कि ‘क्या आप भी भाजपा में जाएंगी?’, तो सायोनी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। उन्होंने तपाक से कहा था, ‘मैं चड्ढा नहीं हूं, जो चड्डी हो जाऊंगी।’ मगर अब वही सायोनी खुद ‘चड्ढा’ हो गई हैं और ईमानदारी का चोगा उतारकर नाचने वालों की महफिल में शामिल हो चुकी हैं। इसीलिए आज कई लोगों के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा है कि राजनीति की ऐसी ‘सायोनी प्रवृत्तियों’ का आखिर किया क्या जाए। किसी की बेईमानी और आसुरी महत्वाकांक्षा उसे ‘थाली का बैंगन’ बना देती है। ‘थाली का बैंगन’ सिर्फ एक मुहावरा नहीं है, बल्कि आज की भारतीय राजनीति का एक कड़वा सच बन चुका है। थाली का बैंगन चूल्हे पर चढ़नेवाली किसी भी सब्जी में घुल-मिल जाता है। भर्ते से लेकर पकौड़ियों तक, यह हर जगह फिट बैठता है। बैंगन का अपना कोई खुद का स्वाद नहीं होता। ठीक इसी तरह, ‘सायोनी घोष’ छाप राजनेताओं की कोई भूमिका, विचारधारा, सिद्धांत या निष्ठा नहीं होती। सत्ता, पद और शोहरत जैसे व्यक्तिगत फायदों के लिए ये इस थाली से उस थाली में छलांग लगाते रहते हैं। ये बैंगन आज कटोरी, थाली, तवे, चूल्हे, चम्मच और कढाई हर जगह होते हैं। राजनीति में आज ऐसे कई ‘बैंगन’ घूम रहे हैं। भारतीय किसानों की फसल को भले ही सही ‘दाम’ न मिल रहा हो, लेकिन मोदी-शाह ने ऐसे बैंगनों को एक निश्चित ‘एमएसपी’ (न्यूनतम समर्थन मूल्य) देकर उनकी तकदीर चमका दी है। महाराष्ट्र की राजनीति में भी पिछले कुछ समय में ‘थाली के बैंगनों’ की भारी पैदावार हुई है और इन बैंगनों की खेती बड़े चाव से की जा रही है। सायोनी घोष का यह पूरा मामला एक गहरा अध्ययन का विषय है, एक ‘केस स्टडी’ है। सायोनी ने थाली के बैंगन की भूमिका को पूरी तरह अपना लिया है।
थाली के ये बैंगन भी गिरगिट की तरह रंग
बदलते हैं। इस विषय पर तो बाकायदा ‘पीएच.डी.’ करके डॉक्टरेट की उपाधि भी हासिल की जा सकती है। सातारा के दरे गांव और बारामती के काटेवाडी इलाके में हाल के दिनों में बैंगनों की ऐसी फसल लहलहाई है कि अब हर ऐरे-गैरे को लगने लगा है कि उसे भी थाली या परात का बैंगन बन जाना चाहिए। भारत का अपना राष्ट्रीय पशु है, राष्ट्रीय पक्षी है, लेकिन आज तक किसी भी सब्जी को ‘राष्ट्रीय सब्जी’ का दर्जा नहीं मिल सका। यह सम्मान अब बैंगन को मिलना चाहिए और इस बैंगन की ‘ब्रांड एंबेसडर’ के रूप में सायोनी घोष, मिंधे (शिंदे) जैसे लोगों को नियुक्त किया जाना चाहिए। यह देश की राजनीति और विचारधारा की अधोगति है। देश में राजनीति अब सिर्फ स्वार्थ का व्यापार बनकर रह गई है। मतदाता किसी एक चुनावी चिह्न और पार्टी के सिद्धांतों को देखकर वोट देते हैं और जिताते हैं, लेकिन राजनीति के ये स्वार्थी ‘बैंगन’ फौरन अपने फायदे के लिए उस थाली से दूसरी तरफ कूद जाते हैं। फिलहाल पश्चिम बंगाल की थाली में इन बैंगनों का क्या भाव चल रहा है? महाराष्ट्र में तो यह भाव २५ करोड़ से लेकर ५० करोड़ रुपये तक था। विधान परिषद यानी स्थानीय निकाय चुनाव के वक्त तो यह पूरा सौदा कुल मिलाकर ५०० करोड़ तक जा पहुंचा, क्योंकि वहां पूरे राज्य के बैंगनों की साम्ाूहिक रूप से होलसेल खरीदारी की गई थी। पश्चिम बंगाल में भले ही बैंगनों का भाव महाराष्ट्र से थोड़ा कम हो, लेकिन सुनने में आया है कि दिल्ली के ‘बैंगन’ १५ करोड़ में और कोलकाता के बैंगन २ करोड़ रुपए में खरीदे गए हैं। बैंगन आजकल बहुत सस्ता और हर जगह उपलब्ध है। बैंगन का अपना कोई मिजाज या स्वाद नहीं होता; जरा-सा खुली हवा में छोड़ दो तो फौरन नरम पड़ जाता है। बैंगन आज के दौर में भरोसे के लायक नहीं रहा। जैसे वह पुरानी कहानी है न ‘चल रे कद्दू ठुमक-ठुमक’, वैसे ही ये बैंगन और इन बैंगनों के आका भी ‘ठुमक-ठुमक’ चलते हुए दिल्ली दरबार पहुंचते हैं। वहां उनकी खाल उतारी जाती है, और फिर उन पर मनमुताबिक नमक-मसाला और रंग पोतकर उन्हें मोदी-शाह की रसोई में टांग दिया जाता है। अंगूर और आम की तो कई नई किस्में अब तक बाजार में आई थीं, लेकिन अब बैंगनों की भी नई-नई किस्में पैदा होने लगी हैं। उन्हीं में से एक नई वैरायटी है ‘सायोनी घोष’ बैंगन! इसमें कोई शक नहीं कि यह बीज आगे चलकर बाजार में ‘सायोनी सीड्स’ के नाम से मशहूर हो जाएगा।
