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संपादकीय : एक `नटसम्राट’ की सनक!

प्रधानमंत्री मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं या गुजरात राज्य के? यह सवाल उठे, ऐसा उनका आचरण है। अपने प्रांत, अपने राज्य से प्रेम होना ही चाहिए, लेकिन ऐसे सभी प्रांतों से मिलकर भारत देश बना है। परंतु मोदी का भारत सिर्फ गुजरात तक सीमित है, वे इतनी संकुचित मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं। सब कुछ गुजरात छीनकर ले जाना उनकी यह विकृति राष्ट्रीय अखंडता और संविधान के खिलाफ है। इसमें एक और घटना जुड़ गई है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह पिछले सात दशकों से राजधानी दिल्ली में होता आ रहा है। मोदी-शाह की जोड़ी ने यह परंपरा तोड़कर ७२वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह गुजरात के एकता नगर में आयोजित करने का निर्णय लिया है। मोदी-शाह ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह दिल्ली से गुजरात स्थानांतरित कर दिया। कल वे देश की राजधानी भी स्थानांतरित कर देंगे। इसलिए इन दोनों को तत्काल दिल्ली से हटाने का संकल्प जनता को और अधिक मजबूती से करना होगा। कई राष्ट्रीय समारोह दिल्ली के विज्ञान भवन या राष्ट्रपति भवन में होते हैं। फिर चाहे वह पद्म पुरस्कार वितरण हो, शौर्य पदक वितरण हो, राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार हो या खेल रत्न पुरस्कार वितरण हो। ऐसे समारोह राष्ट्र की राजधानी में ही होना उचित रहता है। इस अवसर पर देशभर के पुरस्कार विजेता राजधानी आते हैं। उन्हें अपनी राजधानी देखने का अवसर मिलता है। लेकिन मोदी-शाह मंडली ने यह दिल्ली दर्शन बंद करके गुजरात दर्शन शुरू कर दिया। इसके पीछे का उद्देश्य क्या है, यह उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। बल्कि सत्ताधीश के रूप में यह उन दोनों की अंतिम इच्छा हो सकती है और शायद इसीलिए यह सारा प्रयास चल रहा है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का आयोजन स्थल बदलना ही था तो भारत में कई अन्य राज्य हैं, जिनकी संगीत और फिल्मों की महान परंपरा है, उनके बारे में सोचा जा सकता था। मुंबई तो भारत की सबसे बड़ी फिल्म नगरी है। भारतीय
फिल्मों का जन्म ही महाराष्ट्र में
हुआ और पहला फिल्म निर्माण दादासाहेब फाल्के ने किया। इसलिए आयोजन बदलने का पहला अधिकार महाराष्ट्र को मिलना चाहिए था। इसके अलावा कोलकाता और पंजाब के बारे में भी विचार किया जा सकता था। दक्षिण का फिल्म उद्योग बड़ा है और भारतीय फिल्म उद्योग को चमक देने में दक्षिण का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन मोदी-शाह ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह को अपने गुजरात स्थानांतरित कर दिया। कम से कम गंगा किनारे, काशी में ही यह कार्यक्रम कर लेते, लेकिन वह भी नहीं। गुजरात में जल्द ही विधानसभा चुनावों का बिगुल बजने वाला है। इसी एकमात्र कारण से फिल्म समारोह गुजरात ले जाया गया। इसके पीछे एक और कारण हो सकता है, पिछले दस-बारह वर्षों में भारत के तमाम कलाकारों को पीछे छोड़ दे, ऐसा बेहतरीन अभिनय `नरेंद्र कुमार’ यानी मोदी कर रहे हैं। विपक्ष भी मोदी को अभिनय का पुरस्कार देने की मांग करता है। मोदी बेहतरीन हंसते हैं और इशारे पर रोते हैं। तरह-तरह की भूमिकाएं निभाते हैं। चेहरे पर रंग-रोगन करते हैं, कभी ढोल बजाते हैं, कभी होठों से बांसुरी लगाते हैं, कभी अयोध्या के राम मंदिर के व्रतधारी पुजारी बनते हैं, कभी डरपोक और भयभीत होने का अभिनय करते हैं। कभी मुखौटा लगाते हैं, कभी मास्टर बनते हैं, कभी कृष्ण, कभी राम, कभी विष्णु का अवतार बनते हैं, कभी भारतीय जवान की वर्दी पहनते हैं, तो पुलवामा में भारतीय सैनिक मारे जा रहे थे तब जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में शिकारी बनते हैं। इस्लामी देशों में जाकर धर्मनिरपेक्ष बन जाते हैं, तो भारत आकर हिंदुओं के तारनहार की भूमिका निभाते हैं। उस अर्थ में वे राजनीतिक मंच के `नटसम्राट’ हैं, इसलिए यदि उन्होंने तय किया हो कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह उनके अपने गांव में मनाया जाए और उसी बहाने उनके अभिनय युग का समापन हो, तो इस पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में चर्चा होना आवश्यक है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह को
दिल्ली से गुजरात
ले जाने के पीछे मोदी-शाह का इरादा नेक नहीं है। इससे पहले अलग-अलग राज्यों के प्रधानमंत्री हुए, लेकिन नरसिम्हा राव, देवेगौड़ा, अटल बिहारी वाजपेयी या मनमोहन सिंह ने अपने-अपने प्रांतों में राष्ट्रीय पुरस्कार समारोहों को स्थानांतरित नहीं किया। नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, वी. पी. सिंह `उत्तर’ से आए थे, फिर भी उन्होंने दिल्ली के पारंपरिक समारोहों को अमेठी, रायबरेली, फूलपुर या ग्वालियर में आयोजित नहीं किया, लेकिन मोदी-शाह का दिमाग गुजरात से बाहर नहीं जाता। देश के कई शहरों को लूटकर वहां के `माल’ और संस्थानों को इन दोनों ने गुजरात स्थानांतरित कर दिया। २०२३ में एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप का फाइनल मैच गुजरात के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में खेला गया। उस मैच पर हजारों-करोड़ों का सट्टा लगा। २०२४-२५ का फिल्मफेयर पुरस्कार समारोह भी अमदाबाद में ही किया। २०३० के राष्ट्रमंडल खेल और २०३६ के ओलंपिक खेल भी गुजरात में ही आयोजित करने का इस जोड़ी ने फैसला कर लिया। मानो भारत देश में गुजरात ही एकमात्र प्रांत है और बाकी सभी प्रांत बेकार हैं। देश की पूरी सार्वजनिक संपत्ति और देशभर के काम के `ठेके’ सिर्फ गुजरात के लोगों को ही दिलाए जा रहे हैं। यह स्थिति भयावह है। देश की आर्थिक बागडोर सिर्फ अपने ही लोगों के हाथों में रहे और बाकी लोग उनके दरवाजे पर याचक की तरह खड़े रहें, मोदी-शाह की यही मानसिकता है। अब राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह को भी गुजरात ले जाने के पीछे कला प्रेम जैसा कुछ नहीं है, बल्कि बड़ा आर्थिक लेन-देन ही उनका उद्देश्य है। भारतीय फिल्म उद्योग में कभी रीढ़ की हड्डी थी ही नहीं। इसलिए इस बारे में वे कुछ बोलेंगे, इसकी कोई संभावना नहीं है। किसी एक `नटसम्राट’ की सनक के कारण राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह को गुजरात स्थानांतरित करना क्या उचित है?

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