मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : मतदाता रिश्वत योजना!

संपादकीय : मतदाता रिश्वत योजना!

भारत का चुनाव आयोग यानी बेशर्मी की पराकाष्ठा। संवैधानिक पदों पर रहकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के कुछ जज भाजपा की चाकरी कर रहे हैं। इस मामले में पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ का मुखौटा हाल ही में उतर गया है। अगर ये संवैधानिक संस्थाएं भाजपा की ‘शाखाओं’ के रूप में काम कर रही हैं तो देश में चुनाव महज एक दिखावा हैं। बिहार विधानसभा चुनाव पहले भाजपा-नीतीश कुमार गठबंधन के लिए आसान लग रहे थे। राहुल गांधी ने हरियाणा और महाराष्ट्र की तरह वोट चुराकर या खरीदकर बिहार में चुनाव जीतने के उनके मंसूबों को धूल में मिला दिया इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने सरकारी खजाने का इस्तेमाल करके वोट खरीदने की योजना बनाई है। मोदी ने ऐन चुनाव के मौके पर बिहार की ७५ लाख महिलाओं के खातों में १०-१० हजार रुपए जमा किए और इसके लिए एक घंटे में बिहार के खजाने में ७,५०० करोड़ रुपए का फंड ट्रांसफर कर दिया गया। ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के नाम पर यह फंड देना भाजपा को वोट देने के लिए दी गई रिश्वत है। जनता के टैक्स के पैसे से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दी गई यह रिश्वत एक आर्थिक अपराध है। विशेष जानकारी दी गई कि इस पैसे से महिलाओं को उद्योग-धंधे स्थापित करने में मदद मिलेगी।
इस योजना के तहत
१ करोड़ ११ लाख महिलाओं ने आवेदन किया और उनमें से ७५ लाख महिलाओं को यह पैसा स्वीकृत किया गया। अगले दो महीनों में बिहार में चुनाव होने हैं। इस घोषणा से कुछ दिन पहले ही वोट खरीदने के लिए ‘यह’ रिश्वतखोरी की गई। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं पैसे के प्रभाव में भारतीय मतदाताओं को वोट देने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। चुनाव आयोग को सबसे पहले इस पर संज्ञान लेना चाहिए था। यह सामूहिक हत्या की तरह सामूहिक रिश्वतखोरी (मास ब्राइबरी) का मामला है। इससे चुनावों की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर संदेह के बादल छा गए हैं। भारतीय मतदाताओं को इस प्रकार खरीदना और लोकतंत्र पर नियंत्रण पाना चौंकानेवाला है। यह भारत के चुनाव आयोग की मौन सहमति से हो रहा है। जब से भाजपा सत्ता में आई है, हर चुनाव में मतदाताओं को दी जानेवाली सरकारी रिश्वत की मात्रा बढ़ी है। प्रधानमंत्री मोदी देश से किए गए अपने कई वादों को निभाने को तैयार नहीं हैं। वे लोगों को आत्मनिर्भरता का उपदेश तो देते हैं, लेकिन मतदाताओं को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय, उन्हें कमजोर और पंगु बनाते नजर आते हैं। बिहार में महिलाओं के वोट खरीदने का ताजा मामला इसी श्रेणी में आता है। महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव से पहले इस मंडली ने ‘लाडली बहन’ नाम से ऐसी ही एक योजना शुरू की और महिलाओं के खातों में १,५००-१,५०० रुपए जमा कराकर वोट खरीदे। इस योजना के कारण
महाराष्ट्र का आर्थिक गणित
ज्यादा ही बिगड़ गया और मराठवाड़ा में बाढ़ प्रभावित किसानों की मदद के लिए राज्य के खजाने में दमड़ी भी नहीं बची है। राज्य के वित्त मंत्री रोज कहते हैं कि हम लाडली बहनों को हर महीने ४५,००० करोड़ रुपए देते हैं, लेकिन बाढ़ प्रभावित किसानों की मदद की बात नहीं करते। बिहार में भी यही खेल चल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए मोदी ने ७५ लाख महिलाओं के खातों में १०-१० हजार रुपए जमा कराए। १०,००० रुपए से ग्रामीण क्षेत्रों में किस तरह का उद्योग और रोजगार का अवसर पैदा हो सकता है? यह योजना इसलिए लाई गई है ताकि बिहार की लगभग एक करोड़ महिलाएं भाजपा को वोट दें। मराठवाड़ा के बाढ़ प्रभावित किसानों को अभी तक बतौर मदद एक पैसा भी नहीं मिला है और बिहार में चुनाव को देखते हुए महिलाओं को मोदी की भ्रष्टाचार योजना से १०,००० रुपए मिले हैं। यह सरकारी खजाने की लूट है। प्रधानमंत्री का यह कृत्य एक तरह का आर्थिक अपराध स्वरूप का है। बिहार में यह योजना ‘मतदाता रिश्वत योजना’ के अलावा और कुछ नहीं है। निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय के आंखों पर पट्टी बांधने का परिणाम भारत को भुगतना पड़ रहा है। हर भारतीय को मतदाता रिश्वत योजना की निंदा करनी चाहिए। ये तो कुछ ज्यादा ही चल रहा है! अति है!

अन्य समाचार