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संपादकीय : मोगैंबो क्या करेगा?

ज्ञानेश कुमार जैसे मगरूर चीफ इलेक्शन कमिश्नर के खिलाफ हुआ आंदोलन नाकाम हो गया और कॉकरोच पार्टी के आंदोलन का `फ्लॉप शो’ साबित हुआ, ऐसा भारतीय जनता पार्टी ने एलान किया है। भाजपा से ताल्लुक रखने वाले `चाटुकार’ अखबारों ने जन आंदोलन की तौहीन करने वाली सुर्खियां देकर अपनी बेवकूफी और बुजदिली साबित की है। हकीकत में दिल्ली में बिल्कुल उलट हुआ है। दिल्ली में आंदोलन को दमनकारी मार्ग से नष्ट करने का जो प्रयास हुआ, उसे संयुक्त राष्ट्र ने घिनौना बताया है। रविवार को दिल्ली में बड़े पैमाने पर आंदोलन होते समय हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। महिलाओं को घसीटकर प्रिजन वैन में ठूंस दिया। अज्ञात स्थान पर ले जाकर बंदी बनाया, इस बारे में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विभाग ने चिंता व्यक्त की है। भारतीय अधिकारियों को शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार का आदर करना चाहिए और मनमाने ढंग से जिन लोगों को हिरासत में लिया गया है, उन्हें रिहा करना चाहिए, ऐसा आह्वान संयुक्त राष्ट्र ने किया। संयुक्त राष्ट्र के आह्वान को कोई नहीं पूछता यह सच है, लेकिन भारत में यह दमन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बना, यह महत्वपूर्ण है। `न्यू यॉर्क टाइम्स’ और लंदन के समाचार पत्रों में दिल्ली के दमन की तस्वीरें प्रकाशित करके भारत में लोकतंत्र संकट में होने का अवलोकन दर्ज किया, यह प्रधानमंत्री मोदी और उनके समर्थकों के लिए
लज्जास्पद
है। १० तारीख का आंदोलन सफल न हो इसलिए छत्तीसगढ़, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर में जो लाखों सशस्त्र बल आतंकवादी, नक्सलवादी आदि को रोकने के लिए तैनात थे, उन्हें दिल्ली में उतारा गया। संपूर्ण दिल्ली की सीमाओं और गलियों की नाकेबंदी कर दी गई। कृष्ण मेनन मार्ग पर स्थित गृहमंत्री अमित शाह के घर के चारों ओर लाख भर सशस्त्र बल का घेरा पड़ गया है। इंटरनेट सेवा बंद कर दी, मेट्रो पूरी तरह बंद कर दी। बसों, ट्रकों का आवागमन बंद कर दिया। दिल्ली आने वाली रेल गाड़ियों को रास्ते में ही रोक दिया। दिल्ली आने वाले विमान रोक दिए। दीपके, रांका आदि कॉकरोच नेताओं को पुलिस ने विमान में घुसकर गिरफ्तार किया। दिल्ली का आंदोलन रोकने के लिए मोदी सरकार तानाशाही के सभी हथकंडे और औजार इस्तेमाल कर रही थी। क्योंकि सरकार की पैंट गीली हो गई थी। सरकार डर से थर-थर कांप रही थी। यह सारा विरोध तोड़कर विद्यार्थी और समाज के घटक बड़ी संख्या में दिल्ली के आंदोलन में उतरे। फिर भी भाजपा के बुद्धिहीन प्रवक्ता और नेता आंदोलन विफल हुआ ऐसा कह रहे हों तो उन्हें दिमागी बुखार का दौरा पड़ा है और उस पर तुरंत इलाज होना आवश्यक है, ऐसा ही कहना पड़ेगा। मुंबई में अगस्त क्रांति मैदान की ओर निकले तुषार गांधी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। जिस महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया और जिनकी वजह से
भारत मानवतावादी
और लोकतंत्रवादी गांधीजी का देश के रूप में विश्वविख्यात हुआ, उन गांधी के `प्रपौत्र’ को पुलिस ने सत्याग्रह करने से रोका। क्या यह फडणवीस सरकार को शोभा देता है? इतना डर किस बात का? अहिंसक मार्ग से सत्याग्रह करने वालों को जब रोका जाता है तब सरकार के शरीर में छुपा तानाशाह डर गया है, यह स्वीकार करना पड़ेगा। तुषार गांधी की रिहाई के लिए दादाभाई नौरोजी पुलिस स्टेशन जाकर आदित्य ठाकरे और शिवसैनिकों ने आंदोलन किया। यह स्वतंत्रता संग्राम की दावानल भड़कने का लक्षण है। देश की राजधानी में लोकतंत्र से भारत की छवि के टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं। पुलिस को आगे करके डरपोक मोदी सरकार ने तानाशाही के खिलाफ आंदोलन को कुचलने का जो प्रयास किया, वह वास्तव में सफल नहीं हुआ। दिल्ली में आंदोलन करने वाले चार पूर्व मुख्यमंत्रियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। उसमें ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल शामिल हैं। तानाशाह जब डरता है तब उसके अंदर का शैतान खुद के बचाव के लिए सशस्त्र फौलादी दीवारें खड़ी करता है, लेकिन जनता के विद्रोह के आगे ये दीवारें ध्वस्त हो जाती हैं और तानाशाह का अंत होता है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को खलनायक `मोगैंबो’ की उपमा दी है। मोगैंबो ने दस-बारह साल लोगों को प्रताड़ित किया। देश को धोखा दिया। देश की तिजोरी लूटी और मतपेटी भी लूटी। इस लूट का हिसाब मांगने के लिए जनता सड़कों पर उतर आई है। मोगैंबो अब क्या करेगा?

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