-प्रणव प्रियदर्शी
जैसे २० जुलाई का दिन देश के लोकतांत्रिक प्रतिरोध आंदोलनों के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पन्ना बन गया, वैसे ही १० अक्टूबर भी एक न भुलाई जा सकनेवाली तारीख बन गई। दिलचस्प यह है कि इन दोनों में प्रतिरोध आंदोलनों से ज्यादा भूमिका खुद सरकार की रही है।
सरकार की जिद
एक केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुए जंतर-मंतर पार्ट १ आंदोलन को अगर सरकार अपनी जिद के कारण उतना बड़ा न बनने देती और फिर उसे दबाने के लिए पुलिस बल का बर्बर इस्तेमाल नहीं करती, तो २० जुलाई की वह तारीख इतिहास में कोई खास रुतबा हासिल किए बगैर बीत जाती। मंत्री का इस्तीफा भी उसे उतना खास नहीं बना पाता। आखिर किसी लोकतंत्र में जनता की मांग पर एक केंद्रीय मंत्री का जाना ऐसी कोई बड़ी बात तो होती नहीं।
प्रदर्शन पहले से
दस अक्टूबर के साथ भी ऐसा ही हुआ। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर की वापसी की मांग को लेकर प्रदर्शन कोई उसी दिन शुरू नहीं हुआ। मुंबई और दिल्ली में २ अक्टूबर से ही यह आंदोलन शुरू हो चुका था। कांग्रेस कार्यकर्ता तो उससे भी पहले से सड़क पर थे। यह भी स्पष्ट था कि १० अक्टूबर को यह आंदोलन खत्म नहीं होना। मगर सरकार ने कुछ ऐसा व्यवहार किया मानो उसी दिन आरपार की लड़ाई हो।
मरघटी सन्नाटा
न केवल दिल्ली पहुंचने वाली ट्रेनें वैंâसल की गर्इं और सड़क सीमाओं पर कड़ा पहरा लगा दिया गया, बल्कि जंतर-मंतर से लगते पूरे इलाके की ऐसी घेरेबंदी कर दी गई कि प्रदर्शनकारी तो दूर कोई आम दिल्लीवासी भी उस तरफ न फटक सके। नतीजा यह कि उस दिन राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के उस सबसे महत्वपूर्ण और चहल-पहल वाले इलाके में जैसे मरघटी सन्नाटा पसरा हुआ था। कनॉट प्लेस और आसपास के मार्वेâट हों या हनुमान मंदिर, शिवमंदिर और बंगलासाहिब गुरुद्वारा- हर स्थान वैसा ही सुनसान दिख रहा था।
बन गए नए मोर्चे
इस सबके बावजूद प्रदर्शनकारी सड़कों पर सुबह से ही डटे रहे। भले जंतर-मंतर के प्रदर्शनस्थल तक कोई न पहुंच पाया हो, लेकिन वहां पुलिस नाकेबंदी के आसपास छिटपुट संख्या में ही सही, युवा प्रदर्शनकारी लगातार पहुंचते रहे। यह भी हुआ कि जंतर-मंतर का मोर्चा छिना तो कई अन्य मोर्चे बन गए। मसलन, नेहा बोरा की अगुआई में प्रदर्शनकारियों का एक जत्था दिल्ली हाट से ही जुलूस की शक्ल में आगे बढ़ा और अरविंद मार्ग पर उसे काबू करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी।
रास्ता तो है
बहरहाल, सरकार के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह किसी को भी यह नहीं समझा सकती कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की मांग को वह क्यों और वैâसे गलत बता रही है। और देखा जाए तो इस मांग को स्वीकार करना भी ऐसा कोई मुश्किल नहीं है। चूंकि सरकार शुरू से कहती रही है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है इसलिए उसके फैसलों से वह आसानी से पल्ला झाड़ सकती है।
जनहित का वास्ता
एसआईआर समेत इस चुनाव आयोग के जितने भी विवादास्पद फैसले रहे हैं, उन सबका ठीकरा चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों के सिर फोड़ा जा सकता है। ज्ञानेश कुमार को निर्दोष बताते हुए भी सरकार कह सकती है कि चूंकि जनभावना उनके खिलाफ हो गई है और विपक्षी दलों का उन पर भरोसा नहीं रह गया है, इसलिए जनहित में उन्हें स्वेच्छा से पदत्याग कर देना चाहिए।
कोई विकल्प नहीं
सवाल यही है कि क्या सरकार ऐसा करेगी? मौजूदा मोदी सरकार शायद ही ऐसा करने की हिम्मत जुटा पाए। अगर वह इस नाजुक मौके पर एक भी कदम पीछे हटी तो फिर उसके लिए कदम टिकाना कठिन से कठिनतर होता जाएगा। लेकिन वह कदम पीछे न हटाए तो क्या होगा? क्या उस स्थिति में यह मांग खत्म हो जाएगी? प्रदर्शनकारी सड़कों से घर लौट जाएंगे? ऐसा संभव नहीं लग रहा।
एनडीए दलों में बेचैनी
सीजेपी और आईसा जैसे संगठन तो अपनी जगह हैं ही, सबसे बड़ी बात यह कि कोई भी राजनीतिक दल चुनाव परिणामों को टॉप के एक-दो नेताओं और उनके करीबी अफसरों की मर्जी पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं होगा। इंडिया ब्लॉक ही नहीं, एनडीए दलों पर भी यह बात लागू होती है। चिराग पासवान जैसे नेता तो अभी से नाराजगी का संकेत देने लगे हैं। अन्य दल और नेता भी देर-सबेर यह सवाल उठाएंगे। यानी एनडीए, बीजेपी और संघ को कोई न कोई फॉर्मूला निकालना ही होगा। देखने वाली बात सिर्फ यह होगी कि मसले का हल मोदी सरकार की अगुआई में निकलता है या उसकी जगह बनने वाली दूसरी किसी सरकार की अगुआई में।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
