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महाराष्ट्र में ‘बैसाखी’ पर शिक्षा! … ६० फीसदी शिक्षकों के पद पड़े हैं खाली …नई भरती पर महायुति सरकार मौन

-२०४७ तक कैसे विकसित होगा महाराष्ट्र?
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था गहरे संकट में है, लेकिन सत्ता में बैठी महायुति सरकार तमाशबीन बनी हुई है। राज्य के हजारों स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं। बच्चों की पढ़ाई अधर में लटकी है। एक ओर ‘विकसित महाराष्ट्र २०४७’ का नारा उछाला जा रहा है, दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि अनुदानित और गैर अनुदानित शिक्षा संस्थाएं दम तोड़ रही हैं। इसी तरह सरकार की बेरुखी और टालमटोल भरी नीति के कारण शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया ठप पड़ी है, जिससे छात्रों का भविष्य अंधेरे में धकेला जा रहा है। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या बिना शिक्षकों के कोई राज्य सचमुच ‘विकसित’ हो सकता है?
राज्य के कई अनुदानित, अंशत: अनुदानित और बिना अनुदानित विद्यालयों में छात्रों की संख्या के मुकाबले शिक्षकों की भारी कमी है। इससे न केवल पढ़ाई की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ रहा है, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास की संभावनाएं भी क्षीण होती जा रही हैं। खेल, कला, आईसीटी और कार्यानुभव जैसे विषयों के लिए तो अब तक अलग से पद ही नहीं बनाए गए हैं, जिससे इन जरूरी क्षेत्रों की उपेक्षा हो रही है। शिक्षक न होने के कारण पढ़ाई में निरंतरता नहीं रही और विद्यार्थियों की रुचि भी प्रभावित हो रही है। राज्य सरकार ने २०११ में केंद्र के शिक्षा का अधिकार कानून के तहत नियमावली तैयार की थी, जिसके अनुसार सभी बच्चों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन हकीकत यह है कि हजारों पद अब भी खाली पड़े हैं। इससे छात्र-शिक्षक अनुपात बुरी तरह बिगड़ गया है और शैक्षणिक प्रक्रिया ठप होती जा रही है। विकसित महाराष्ट्र २०४७ का सपना दिखाने वाली महायुति सरकार आज तक शिक्षक भरती को लेकर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई है। इससे साफ है कि सरकार को बच्चों की शिक्षा से नहीं, केवल सत्ता की राजनीति से मतलब है।
महायुति ने स्थिति को बना दिया और जटिल
महायुति सरकार ने बंचिंग सिस्टम रद्द करके स्थिति को और जटिल बना दिया है। पहले कक्षा १ से ५, ६ से ८ और ९ से १० तक छात्रों की संख्या नैसर्गिक रूप से समायोजित होती थी, जिससे शिक्षक नियुक्ति के लिए एक संतुलन बना रहता था, लेकिन अब इस प्रणाली के खत्म होने से छात्रों की संख्या में असंतुलन पैदा हुआ है और पूर्व निर्धारित मानदंड अप्रासंगिक हो गए हैं। इसके बावजूद सरकार अब भी पुराने नियमों के आधार पर शिक्षक संख्या तय कर रही है, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण और अव्यावहारिक है।
विषयों को किया जा रहा नजरअंदाज
शिक्षकों की कमी का असर केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर भी पड़ रहा है। खेल, कला, कंप्यूटर शिक्षा और कार्यानुभव जैसे विषयों के लिए स्वतंत्र पद ही नहीं बनाए गए हैं। परिणामस्वरूप इन विषयों को या तो नजरअंदाज किया जा रहा है या फिर दूसरे विषयों के शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है।

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