भारतीय रेलवे ने दिल्ली-पलवल रूट पर कवच ४.० लागू कर ट्रेन सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यह तकनीक आमने-सामने आती ट्रेनों, सिग्नल की अनदेखी और गति सीमा उल्लंघन जैसी स्थितियों में लोको पायलट को चेतावनी देती है और जरूरत पड़ने पर अपने आप ब्रेक लगाकर ट्रेन को रोक सकती है। यानी यह केवल चेतावनी प्रणाली नहीं, बल्कि दुर्घटना रोकने वाला सक्रिय सुरक्षा कवच है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह कवच भारतीय रेल के विशाल नेटवर्क के कितने हिस्से को सचमुच सुरक्षा दे पाया है? उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली-पलवल परियोजना में २१.६ रूट किलोमीटर और ८६ ट्रैक किलोमीटर क्षेत्र को कवच के दायरे में लाया गया है। वर्ष २०२४-२५ के हिसाब से भारतीय रेलवे का नेटवर्क करीब ६९,१८१ रूट किलोमीटर और १,०९,७४८ ट्रैक किलोमीटर है। इस आधार पर देखें तो २१.६ रूट किलोमीटर कवच सुरक्षा कुल रूट नेटवर्क का केवल ०.०३१ प्रतिशत है। ट्रैक किलोमीटर के आधार पर ८६ किलोमीटर कवच सुरक्षा कुल १,०९,७४८ ट्रैक किलोमीटर का लगभग ०.०७८ प्रतिशत बैठती है। यदि अधिकतम १,३७,५२२ ट्रैक किलोमीटर का आधार लें तो यह हिस्सा और घटकर करीब ०.०६३ प्रतिशत रह जाता है।
अर्थात तकनीक बड़ी है, दावा बड़ा है, लेकिन कवरेज अभी अत्यंत छोटा है। यह शुरुआत जरूर है, पर इसे व्यापक सुरक्षा उपलब्धि कहना जल्दबाजी होगी।
कवच की कहानी भी नई नहीं है। एंटी-कोलिजन डिवाइस पर काम वर्ष २००० में शुरू हुआ और फरवरी २००२ में कोकण रेलवे ने गोवा के मडगांव में इसका पहला परीक्षण किया था। उस हिसाब से देखें तो आज का कवच ४.० लगभग २४ साल बाद व्यवहारिक रूप से प्रमुख रूटों पर पहुंच रहा है। यदि काम शुरू होने के वर्ष २००० से गिनें तो यह यात्रा २६ साल लंबी हो चुकी है।
निचोड़ साफ है, कवच ४.० रेलवे सुरक्षा की दिशा में जरूरी और स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन भारतीय रेलवे को सचमुच सुरक्षित बनाना है तो इसे चुनिंदा रूटों की तकनीकी उपलब्धि से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय स्तर की समयबद्ध सुरक्षा क्रांति बनाना होगा।
