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सत्ता मेलोडी में मस्त है! …जनता ‘मीम’ और ‘वास्तविक’ अर्थव्यवस्था का फर्क समझे

अनिल तिवारी
देश की राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। कभी चाय प्रतीक बनती है, कभी झा़ड़ू, कभी गारंटी, कभी सेंगोल, कभी कमल का फूल, कभी झंडा और अब एक टॉफी भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गई है। इटली दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को ‘मेलोडी’ टॉफी का पैकेट भेंट किया और देखते ही देखते मेलोडी फिर इंटरनेट पर छा गई। वीडियो वायरल हुआ, सोशल मीडिया ने इसे कूटनीति की मिठास बताया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर टॉफी की खोज बढ़ गई। वैसे भारत का टॉफी निर्यात वित्त वर्ष २०१४ के ४९.६८ करोड़ रुपए से बढ़कर वित्त वर्ष २०२६ में १३२ करोड़ रुपए तक पहले ही पहुंच गया है, यानी करीब १६६ प्रतिशत की वृद्धि। लेकिन सवाल यह है कि क्या देश की अर्थव्यवस्था की पूरी कहानी अब टॉफी की मिठास से लिखी जाएगी? क्या १३२ करोड़ रुपए का टॉफी निर्यात उस भारत की बेचैनी को ढक सकता है, जहां महंगाई रसोई तक पहुंच चुकी है, रोजगार युवाओं की पकड़ से दूर होता जा रहा है और छोटे व्यापारी ऑनलाइन बाजार तथा लागत के दबाव में पिस रहे हैं?
एक तरफ सरकार ‘मेलोडी’ की गूंज को उपलब्धि की तरह पेश कर रही है, दूसरी तरफ विपक्ष अर्थव्यवस्था की बुनियादी हालत पर सवाल उठा रहा है। राहुल गांधी इस मनोवृत्ति की आलोचना कर रहे हैं तो अखिलेश यादव ने दावा किया है कि दुनिया की सबसे बड़ी १०० कंपनियों की सूची में अब भारत की कोई कंपनी नहीं बची है और यह भाजपा की आर्थिक नीतियों का दुष्परिणाम है। उनके आरोप राजनीतिक हो सकते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी चिंता को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत में उत्पादन, मांग, रोजगार, छोटे कारोबार, निर्यात और निवेश को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। असल समस्या यह है कि देश को ‘मीम अर्थव्यवस्था’ और ‘वास्तविक अर्थव्यवस्था’ के बीच फर्क समझना होगा।
सोशल मीडिया पर टॉफी ट्रेंड कर सकती है, शेयर बाजार में नाम की समानता से किसी कंपनी के शेयर चढ़ सकते हैं, लेकिन इससे कारखाने नहीं चलते, नौकरियां नहीं बनतीं और आम आदमी की जेब नहीं भरती। खबरों के अनुसार, मेलोडी प्रसंग के बाद पारले इंडस्ट्री के शेयरों में भी उछाल दिखा, जबकि यह उत्साह वास्तविक औद्योगिक मजबूती से ज्यादा प्रतीक और भ्रम पर आधारित लगा।
प्रधानमंत्री का विदेश में भारतीय उत्पाद भेंट करना गलत नहीं है। यह सांस्कृतिक और व्यापारिक संकेत भी हो सकता है। लेकिन जब देश में पेट्रोल-डीजल, गैस, शिक्षा, स्वास्थ्य, किराया और खाद्य वस्तुओं की कीमतें आम नागरिक को दबा रही हों, तब टॉफी की मिठास पर सरकारी उत्सव थोड़ी असहजता पैदा करता है। जनता पूछती है, जब जेब खाली है, रोजगार अधूरा है और बाजार सुस्त है, तब सत्ता किस ‘मेलोडी’ में मग्न है?
भारत को टॉफी निर्यात की सफलता पर गर्व होना चाहिए, लेकिन केवल टॉफी बिजनेस से अर्थव्यवस्था की ट्रॉफी नहीं जीती जा सकती। ट्रॉफी तब मिलेगी जब छोटे दुकानदार बचेंगे, किसान की लागत घटेगी, उद्योग को मांग मिलेगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा और भारतीय कंपनियां सचमुच विश्व बाजार में शीर्ष स्थानों पर लौटेंगी। फिलहाल तस्वीर यही है कि देश कड़वी आर्थिक बहस से गुजर रहा है और सत्ता अपनी अलग ही ‘मेलोडी’ गा रही है।

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