रामदिनेश यादव / मुंबई
भारी प्रचार और बड़े दावों के साथ शुरू की गई समुद्री मार्ग की रो रो सेवा परियोजना को अब तकनीकी खराबी का हवाला देकर अनिश्चितकाल के लिए बंद करना पड़ा है। कोकण तक आसान और तेज सफर का सपना दिखाकर करोड़ो खर्च कर शुरू की गई मुंबई-विजयदुर्ग रो-रो सेवा अब सरकार के लिए बड़ी किरकिरी बनती नजर आ रही है। इस परियोजना को सिर्फ मंत्री नितेश राणे की जिद पर सीएम फडणवीस ने मंजूरी दी थी। अब यह सरकार के लिए सफेद हाथी बन गई है।
विपक्ष और राजनीतिक गलियारों में इसे महायुति सरकार का फ्लॉप परियोजना और पूरी तरह घाटे का सौदा बताया जा रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि उद्घाटन की पहली फेरी में ४१३ यात्रियों का आंकड़ा दिखाकर इस परियोजना को बड़ी सफलता बताया गया था, लेकिन बाद की फेरियोेंं में यात्रियों की संख्या लगातार गिरती चली गई। इससे परियोजना की व्यवहारिकता और योजना पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि यात्रियों की भारी कमी के बावजूद सरकार केवल कुछ मंत्रियों की प्रतिष्ठा बचाने के लिए इस सेवा को लगातार चलाती रही और करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए। हालात ऐसे थे कि कई फेरियों में विशाल जहाज लगभग खाली दौड़ते रहे, फिर भी परियोजना को बंद करने का निर्णय टालते रहने की कोशिश होती रही।
सरकार ने दिया दिखावटी परियोजना पर जोर
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कोकण की वास्तविक यातायात समस्याओं को हल करने के बजाय सरकार ने दिखावटी परियोजना पर जोर दिया। रेल और सड़क मार्ग की मूल समस्याएं जस की तस बनी रहीं, जबकि रो-रो सेवा पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए। अब सेवा बंद होने के बाद सरकार की कार्यशैली और परियोजना नियोजन को लेकर तीखी आलोचना हो रही है।
आंकड़ों के आईने में यात्रियों की संख्या
आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई-विजयदुर्ग रो-रो सेवा की कुल १२ फेरियों में केवल ८९४ यात्रियों और १५४ वाहनों का ही परिवहन हो सका। ६२० यात्रियों की क्षमता वाले जहाज में ५ मार्च की विजयदुर्ग-मुंबई फेरी में एक भी यात्री नहीं था। वहीं १९ मार्च की फेरी में केवल एक यात्री ने सफर किया। अधिकांश फेरियों में यात्रियों की संख्या ३० से ४० के बीच ही सीमित रही।
