उमेश गुप्ता / वाराणसी
बुधवार को दुर्गा पूजा महोत्सव का समापन मां दुर्गा की विदाई के साथ हुआ। बंगाली समुदाय की महिलाओं ने पारंपरिक सिंदूर खेला की रस्म निभाई और मां को नम आंखों से विदा किया। इस दौरान पंडालों में मां के जयकारे गूंजते रहे। श्रद्धालुओं ने अगले साल फिर आने की प्रार्थना की। विदाई के मौके पर ‘आश्छे बोछोर आबार होबे’ यानी ‘मां, अगले साल फिर आना’ की गूंज सुनाई दी।
लाल-सफेद साड़ियों में सजी महिलाओं ने मां दुर्गा के माथे और चरणों में सिंदूर अर्पित कर आशीर्वाद लिया। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सौभाग्य, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। परंपरा के अनुसार, सबसे पहले दर्पण में मां का प्रतीकात्मक विसर्जन किया गया। इसके बाद अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के साथ विदाई की रस्में निभाई गईं।
10 दिनों तक चलने वाला मां दुर्गा के आगमन का उत्सव अब उनकी विदाई के साथ संपन्न हो गया। इस दौरान भक्तों की आंखों में विदाई का गम दिखाई दिया, तो अगले साल मां के दोबारा आगमन और दर्शन की उम्मीद भी बनी रही। अब श्रद्धालुओं को मां के दर्शन के लिए एक साल इंतजार करना होगा।
पूजा पंडालों में आई महिलाओं ने बताया कि हम सिंदूर खेला इसलिए करते हैं, क्योंकि मां दुर्गा को बेटी की तरह मायके बुलाते हैं। जिस तरह शादी के बाद बेटी पहली बार अपने चार बेटों के साथ मायके आती है, उसी तरह हम मां दुर्गा का स्वागत करते हैं। विदाई के समय बेटी को फल आदि देकर ससुराल भेजा जाता है। सिंदूर खेला की रस्म इसी परंपरा का प्रतीक है। मां दुर्गा मायके आई थीं और अब अपने ससुराल लौट रही हैं।
