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राष्ट्रीय उद्यानों के वन श्रमिकों की बल्ले-बल्ले!..हाई कोर्ट ने दिया सभी लाभ देने का आदेश

सामना संवाददाता / मुंबई

न्यूनतम सुविधाओं या सुरक्षा उपकरणों के साथ जोखिम में काम करनेवाले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बिना किसी भेदभाव के स्थायी कर्मचारियों के समान लाभ के हकदार हैं। ऐसा निर्णय मुंबई उच्च न्यायालय ने संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में काम कर रहे वन श्रमिकों के संदर्भ में दिया है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में वन विभाग में वन श्रमिक के रूप में सेवा दे चुके २२ कर्मचारियों को दिलासा देते हुए स्थायी कर्मचारी के मिलनेवाले सभी लाभ के भुगतान का भी आदेश दिया।
न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की एकल पीठ ने कहा कि इस बात के प्रमाण हैं कि ये कर्मचारी लंबे समय से वन विभाग में सेवा दे रहे हैं। इसलिए उन्हें उनके कानूनी लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। साथ ही औद्योगिक न्यायालय के फैसले को रद्द किया जाता है। इन कर्मचारियों ने औद्योगिक न्यायालय के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं की कार्य पद्धति स्थायी कर्मचारियों जैसी ही है, कोई अंतर नहीं है। औद्योगिक न्यायालय ने स्थायी कर्मचारियों के रिक्त पदों या अनुपलब्धता के आधार पर याचिकाकर्ताओं को स्थायी कर्मचारी का दर्जा देने से इनकार करने का पैâसला सुनाया था। पीठ ने यह भी कहा कि कर्मचारियों को अर्जित अवकाश, चिकित्सा सुविधाओं और समाज कल्याण अधिनियम के तहत मिलनेवाले लाभों से वंचित करके उनका शोषण किया जा रहा है। न्यायालय ने सरकार की याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को दो सप्ताह में बकाया वेतन का भुगतान करने और दस सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
अदालत का कहना था कि याचिकाकर्ताओं ने लगातार पांच वर्षों तक प्रत्येक वर्ष २४० दिन काम करने की शर्तों का पालन किया है। इसके बाद भी वन विभाग स्वीकृत पद के अभाव के आधार पर उन्हें स्थायी दर्जा देने से वंचित नहीं कर सकता और अदालत उन पर विचार नहीं कर सकती। दूसरी ओर, अदालत ने मुख्य वन संरक्षकों द्वारा प्रमुख सचिवों को भेजे गए पत्र का संज्ञान लिया। तदनुसार, ३१ जून १९९६ के सरकारी आदेश के अनुसार, नियमित किए गए ८,०३८ कर्मचारियों के वेतन की जानकारी और अनुमोदन मांगा था। पत्र में १२,९९१ पदों के सृजन का भी उल्लेख किया गया था। इन सब बातों को संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने औद्योगिक न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की।
बता दें कि याचिकाकर्ता २००३ से संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में चतुर्थ श्रेणी वन मजदूर के रूप में गार्ड, रसोइया और माली के रूप में काम कर रहे थे। वे कठोर परिस्थितियों में अन्य बेहद खतरनाक काम भी करते थे, जैसे कि पिंजरों की सफाई, बाघ, शेर, तेंदुआ जैसे जंगली जानवरों को दवाइयां देना। उनके लंबे काम के कारण जानवर उनसे परिचित हो गए थे, इसलिए उनकी भूमिका अपरिहार्य हो गई थी। एक दशक की सेवा के बाद भी सरकार ने उन्हें स्थायी दर्जा देने का उनका अनुरोध अस्वीकार कर दिया था। इस संबंध में औद्योगिक न्यायालय ने १२ दिसंबर, २०२२ को ७७ श्रमिकों द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया था। उस फैसले के विरोध में २२ श्रमिकों ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने वन श्रमिकों को राहत देते हुए उन्हें स्थायी कर्मचारी लाभ देने का आदेश दिया है।

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